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स॒मु॒द्रे त्वा॑ नृ॒मणा॑ अ॒प्स्व१॒॑न्तर्नृ॒चक्षा॑ ईधे दि॒वो अ॑ग्न॒ ऊध॑न् । तृ॒तीये॑ त्वा॒ रज॑सि तस्थि॒वांस॑म॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षा अ॑वर्धन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

samudre tvā nṛmaṇā apsv antar nṛcakṣā īdhe divo agna ūdhan | tṛtīye tvā rajasi tasthivāṁsam apām upasthe mahiṣā avardhan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒मु॒द्रे । त्वा॒ । नृ॒ऽमनाः॑ । अ॒प्ऽसु । अ॒न्तः । नृ॒ऽचक्षाः॑ । ई॒धे॒ । दि॒वः । अ॒ग्ने॒ । ऊध॑न् । तृ॒तीये॑ । त्वा॒ । रज॑सि । त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । अ॒पाम् । उ॒पऽस्थे॑ । म॒हि॒षाः । अ॒व॒र्ध॒न् ॥ १०.४५.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:45» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:28» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नि ! (त्वा) तुझे (नृमणाः-नृचक्षाः) मनुष्यों में मननबल का प्रेरक तथा मनुष्यों के कर्म का द्रष्टा परमात्मा (दिवः-ऊधन्) द्युलोक के ज्योतिमण्डल में सूर्यरूप से, तथा (समुद्रे-अप्सु-अन्तः ईधे) अन्तरिक्ष में मेघों के अन्दर विद्युद्रूप में दीप्त करता है (तृतीये रजसि तस्थिवांसम्) तीसरे पृथिवीलोक में स्थित ओषधियों में कोष्ठों में वर्त्तमान, तथा (अपाम्-उपस्थे) जलप्रवाहों के मध्य में वर्तमान (महिषाः-अवर्धन्) ऋत्विज् विद्वान प्रकट करते हैं-बढ़ाते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा आग्नेय तत्त्व को द्युलोक में सूर्यरूप से, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से, पृथिवी पर पार्थिव अग्नि के रूप में उत्पन्न करता है, पुनः ऋत्विक् लोग य विद्वान् उसे अपने विविध कार्यों में प्रकट करके उपयोग में लाते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'नृमणाः, नृचक्षाः, महिषः '

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्नि ! (त्वा) = तुझे (समुद्रे) = [ स मुद्] आनन्द की वृत्ति से युक्त (अप्सु अन्तः) = हृदयान्तरिक्ष के अन्दर (नृमणाः) = मनुष्यों के प्रति अनुग्रह युक्त मनवाला व्यक्ति (ईधे) = दीप्त करता है । लोकहित की वृत्तिवाला पुरुष 'नृमणाः ' है, यह अपने हृदय में एक अद्भुत उत्साह की अग्नि को जगाता है, वह अग्नि भी 'नृमणा: ' नामवाली से कही जाती है । [२] (नृचक्षाः) = मनुष्यों को ज्ञान का प्रकाश देनेवाला व्यक्ति (दिवः ऊधन्) = द्युलोक की छाती में, अर्थात् मस्तिष्क में (ईधे) = ज्ञानाग्नि को समिद्ध करता है । इसे समिद्ध करके ही तो वह औरों को प्रकाश देनेवाला होता है। [३] (तृतीये रजसि) = कर्मों की गोद में, अर्थात् क्रियामय जीवन बिताते हुए (महिषा:) = प्रभु के उपासक (अवर्धन्) = बढ़ाते हैं । जाठराग्नि को ठीक रखने के लिये दोनों ही बातें आवश्यक हैं । क्रियाशीलता भी आवश्यक है, इससे शरीर के रुधिराभिसरण में न्यूनता नहीं आती । उपासना भी आवश्यक है, इससे वृत्ति-वैषयिक नहीं बनती और हम अतिभोजनादि में पड़कर जाठराग्नि को बुझा नहीं लेते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम 'नृमणा' बनकर हृदय की अग्नि को प्रज्वलित करें, 'नृचक्षा' बनकर ज्ञानाग्नि को तथा 'महिष' उपासक बनकर जाठराग्नि को ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्ने ! (त्वा) त्वाम् (नृमणाः-नृचक्षाः) नृषु मननबलं प्रेरकः प्रजापतिः परमात्मा “प्रजापतिर्वै नृमणाः” [श० ६।७।४।३] स एव नृणां द्रष्टा तेषां कर्मव्यवहारस्य ज्ञाता परमात्मा “प्रजापतिर्वै नृचक्षाः” [श० ६।७।४।५] (दिवः-ऊधन्) द्युलोकस्य ज्योतिर्मण्डले सूर्यरूपेण, तथा (समुद्रे-अप्सु-अन्तः-ईधे) अन्तरिक्षे मेघरूपेषु जलेषु विद्युद्रूपेण दीपयति (तृतीये रजसि तस्थिवांसम्) तृतीये पृथिवीलोके स्थितं वर्तमानौषधिषु काष्ठेषु वर्तमानम् तथा (अपाम्-उपस्थे) जलप्रवाहाणां मध्ये वर्तमानम् (महिषाः-अवर्धन्) ऋत्विजो विद्वांसो “ऋत्विजो वै महिषाः” [श० १२।१।८।२] वर्धयन्ति प्रकटीकरणेन ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, the fluid energy excites and kindles you in the currents in the depths of the waters; in the region of light, the sun that illuminates the world of humanity produces and radiates you; and in the third region of the skies, the energy of the winds produces and augments you as you abide in the depths of the cloud.