'नृमणाः, नृचक्षाः, महिषः '
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्नि ! (त्वा) = तुझे (समुद्रे) = [ स मुद्] आनन्द की वृत्ति से युक्त (अप्सु अन्तः) = हृदयान्तरिक्ष के अन्दर (नृमणाः) = मनुष्यों के प्रति अनुग्रह युक्त मनवाला व्यक्ति (ईधे) = दीप्त करता है । लोकहित की वृत्तिवाला पुरुष 'नृमणाः ' है, यह अपने हृदय में एक अद्भुत उत्साह की अग्नि को जगाता है, वह अग्नि भी 'नृमणा: ' नामवाली से कही जाती है । [२] (नृचक्षाः) = मनुष्यों को ज्ञान का प्रकाश देनेवाला व्यक्ति (दिवः ऊधन्) = द्युलोक की छाती में, अर्थात् मस्तिष्क में (ईधे) = ज्ञानाग्नि को समिद्ध करता है । इसे समिद्ध करके ही तो वह औरों को प्रकाश देनेवाला होता है। [३] (तृतीये रजसि) = कर्मों की गोद में, अर्थात् क्रियामय जीवन बिताते हुए (महिषा:) = प्रभु के उपासक (अवर्धन्) = बढ़ाते हैं । जाठराग्नि को ठीक रखने के लिये दोनों ही बातें आवश्यक हैं । क्रियाशीलता भी आवश्यक है, इससे शरीर के रुधिराभिसरण में न्यूनता नहीं आती । उपासना भी आवश्यक है, इससे वृत्ति-वैषयिक नहीं बनती और हम अतिभोजनादि में पड़कर जाठराग्नि को बुझा नहीं लेते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम 'नृमणा' बनकर हृदय की अग्नि को प्रज्वलित करें, 'नृचक्षा' बनकर ज्ञानाग्नि को तथा 'महिष' उपासक बनकर जाठराग्नि को ।