पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = त्रिलोकी में भिन्न-भिन्न रूपों में स्थित होनेवाली अग्नि ! (ते) = तेरे (त्रेधा) = तीन प्रकार के (त्रयाणि) = तीनों रूपों को (विद्या) = हम जानते हैं। मस्तिष्करूप द्युलोक में तू ज्ञानाग्नि के रूप से है, शरीर में जाठराग्नि के रूप से तथा हृदय में लोकानुग्रहात्मक अग्नि के रूप में । (पुरुत्रा) = बहुत प्रकार से (विभृता) = धारण किये गये (ते धाम) = [धामानि] तेरे तेजों को (विद्मा) = हम जानते हैं। ज्ञानाग्नि के रूप में तेरा तेज कर्मदोष को दूर करता है, जाठराग्नि के रूप में यह रोग-दोष का दूर करनेवाला है और 'नृमणा' अग्नि के रूप में यह स्वार्थ-दोष को भस्म करता है । [२] हम (ते परमं नाम) = तेरे उत्कृष्ट यश को (यत्) = जो (गुहा) = सामान्य लोगों से छिपा हुआ है, उनकी अनुभूति का विषय नहीं है, उसे विद्मा जानते हैं । इन अग्नियों को धारण करने के कारण इनका लाभ जीवन में अनुभव होता है, उसी समय इनका यश हमारे सामने प्रकट होता है । [३] हम (तम्) = उस (उत्सम्) = स्रोत को भी (विद्मा) = जानते हैं (यतः) = जहाँ से कि (आजगन्थ) = तुम प्रकट होते हो । वस्तुतः इन सब अग्नियों के प्रादुर्भाव का स्रोत वह प्रभु रूप महान् अग्नि ही है । सम्पूर्ण ज्ञान को सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु ही देते हैं, जाठराग्नि की स्थापना करनेवाले वे ही हैं, हृदय में 'नृमणा' अग्नि का उदय प्रभु की कृपा से ही होता है। प्रभु का उपासन ही हमें स्वार्थ से ऊपर उठाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानाग्नि, जाठराग्नि व हृदयस्थ 'नृमणा' अग्नि प्रभु कृपा से ही प्रज्वलित होती हैं ।