पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्निः) = अग्रेणी प्रभु (ऋषिभिः) = तत्त्वद्रष्टा लोगों से मन्त्रों द्वारा [ऋषि द्रष्टा, मन्त्र] (अस्तावि) = स्तवन किये जाते हैं। ये प्रभु (नराम्) = [नृ नये] अपने को उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले पुरुषों का (सुशेवः) = उत्तम कल्याण करनेवाले हैं। (वैश्वानरः) = सभी मनुष्यों में इन प्रभु का वास है 'विश्वेषु नरेषु भवः' । (सोमगोपाः) = सोम का ये रक्षण करनेवाले हैं। प्रभु स्मरण से वृत्ति सुन्दर बनती है, विलास से मनुष्य ऊपर उठता है और वीर्य को नष्ट होने से बचा पाता है । [२] इस प्रकार वीर्यरक्षण से शक्तिशाली बनकर हम द्यावापृथिवी द्युलोक व पृथिवीलोक को, अर्थात् सारे संसार को (अद्वेषे) = अद्वेष में हुवेम पुकारते हैं। किसी के भी प्रति द्वेष की भावनावाले नहीं होते । [३] (देवाः) = हे देवो ! इस प्रकार हमारे जीवनों को द्वेषशून्य बनाकर आप अस्मे हमारे लिये (सुवीरं रयिम्) = उत्तम वीरतावाले धन को (धत्त) = धारण करो। हमें धन प्राप्त हो, धन के साथ वीरता प्राप्त हो । धन से विषयों की ओर जाकर हम अवीर न बन जायें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्मरण मनुष्य को वासनाओं से बचाकर सुरक्षित सोमवाला बनाता है, सोमी [वीर्यवान्] पुरुष निर्देष होता है, वीरतायुक्त धन को प्राप्त करता है । यह सूक्त 'ज्ञानाग्नि, जाठराग्नि व नृमणा' अग्नियों के वर्णन से प्रारम्भ होता है, [१] इन तीन अग्नियों का स्रोत प्रभुरूप महान् अग्नि हैं, [२] इन तीनों अग्नियों का हमें वर्धन करना चाहिए, [३] अग्नि रूप प्रभु की प्रेरणा के सुनने पर हमारा जीवन प्रकाशमय होगा, [४] प्रभु प्रिय व्यक्ति धन-सम्पन्न होता हुआ उदार होता है, [५] यह वसुधा को अपना परिवार समझता है, [६] सर्वहितचिन्तक व पावक होता है, [७] श्री सम्पन्न बनकर यह तत्त्वद्रष्टा होने से उसमें आसक्त नहीं होता, [८] हम आचार्यों से ज्ञान का भोजन को प्राप्त करें, [९] उत्तम यशस्वी कर्मों व स्तोत्रों से प्रभु-स्तवन करनेवाले बनें, [१०] हमारे जीवन में विष्णु व लक्ष्मी दोनों का स्थान हो, [११] प्रभु-स्तवन से सोम का रक्षण करते हुए निर्दोष जीवनवाले हों, [१२] प्रभु का पूजन वही करता है जो वदति - मुख से प्रभु के नामों का उच्चारण करता है और प्रीणाति = अपने उत्तम कर्मों से प्रभु को प्रीणित करता है। प्रभु-पूजन करता हुआ यह कहता है कि-