पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्राण जीवात्मा के साथ रहते हैं, उपनिषद् के शब्दों में उसी प्रकार जैसे कि पुरुष के साथ छाया। छाया पुरुष का साथ नहीं छोड़ती, प्राण आत्मा का साथ नहीं छोड़ते। इसीलिए प्राणों को यहाँ 'सधमादः '' जीव के साथ आनन्दित होनेवाले' कहा गया है। ये प्राण जितेन्द्रिय पुरुष को प्रभु के प्रति ले चलनेवाले हैं, सो 'इन्द्रवाह: ' हैं। शक्तिशाली होने से 'उग्रासः ' हैं और अत्यन्त बढ़े हुए होने से, सब उन्नतियों का कारण होने से 'तविषासः' कहे जाते हैं । [२] इन प्राणों से कहते हैं कि (सधमादः) = जीव के साथ आनन्द को अनुभव करनेवाले, (इन्द्रवाह:) = जितेन्द्रिय पुरुष को प्रभु के समीप प्राप्त करानेवाले, (उग्रासः) = तेजस्वी (तविषासः) = प्रवृद्ध व बल-सम्पन्न प्राणो ! आप (एनम्) = इस जीव को (ईम्) = निश्चय से (अस्मत्रा) = हमारे समीप आवहन्तु ले आओ। उस जीव को जो [क] (नृपतिम्) = उन्नतिशील पुरुषों का प्रमुख है, [ख] (वज्रबाहुम्) = बाहु में क्रियाशीलता रूप वज्र को लिये हुए है, सदा क्रियाशील है, [ग] (उग्रम्) = जो तेजस्वी है, [घ] (प्रत्वक्षसम्) = अपने बुद्धि को बड़ा सूक्ष्म बनानेवाला है, [ङ] (वृषभम्) = शक्तिशाली होता हुआ सब पर सुखों का वर्षण करनेवाला है, [च] (सत्यशुष्मम्) = सत्य के बलवाला है। वस्तुतः प्राणसाधना से मनुष्य के जीवन में ये सब गुण उत्पन्न होते हैं और इन गुणों को उत्पन्न करके प्राण इसे प्रभु के समीप प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से जीव शक्तिशाली व सत्य के बलवाला और सूक्ष्म बुद्धि से युक्त होता है। इन तीनों बातों का सम्पादन करके यह प्रभु के समीप पहुँचता है।