पदार्थान्वयभाषाः - इन दोनों मन्त्रों का व्याख्यान ४२.१० तथा ४२.११ पर द्रष्टव्य है । जीवन की यज्ञमयता के लिये जौ व गोदुध का आहार अत्यन्त आवश्यक है। यहाँ यह बात भी प्रसंगवश ध्यान देने योग्य है कि ४२,४३ तथा ४४ तीनों सूक्त 'कृष्ण आंगिरस' ऋषि के हैं। तीनों ही सूक्त इन्हीं दो मन्त्रों पर समाप्त होते हैं। कृष्ण भगवान् के जीवन के साथ भी गौवों का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। वस्तुतः अपनी ओर गुणों को आकृष्ट करने के लिये [कृष्] तथा अंग-प्रत्यंग में रसमय व शक्तिशाली बनने के लिये 'गोदुग्धं व जौ' का प्रयोग आवश्यक ही है। इस ४४ सूक्त के प्रारम्भ में कहा है कि हम 'स्व-पति' बनें, हमारा शरीररूप-रथ 'उत्तम स्थान व दृढ़ता' वाला हो, [२] हम सत्यशुष्म बनें, [३] सोम [वीर्य] की महिमा को समझें [४] हमारा यह शरीररूप पात्र मलिनताओं से अनाधृष्य हो, [५] हम यज्ञिय नाव पर आरोहण करें, [६] हम पीछे न हटकर आगे ही आगे बढ़ें, [७] हमारे शरीर व मस्तिष्क समीचीन हों, [८] जीवन हमारा यज्ञमय हो, [९] गोदुग्ध व जौ के प्रयोग से हमारी वृत्ति सात्त्विक बने, [१०] प्रभु सर्वतः हमारे रक्षक हों, [११] हम अपने जीवनों में तीनों अग्नियों को प्रज्वलित करके प्रभु के प्रिय बनें। यह प्रभु का प्रिय बननेवाला ' वदति' प्रभु के गुणों का उच्चारण करता है और अपने कर्मों से 'प्रीणाति' प्रभु को प्रीणित करता है । यह अपने जीवन में 'भलं वर्णत्रियं दनं दानं यस्य' स्तुत्व दानवाला होता है। इस प्रकार यह 'वत्सप्री- भालन्दन' बनता है-