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आपो॒ न सिन्धु॑म॒भि यत्स॒मक्ष॑र॒न्त्सोमा॑स॒ इन्द्रं॑ कु॒ल्या इ॑व ह्र॒दम् । वर्ध॑न्ति॒ विप्रा॒ महो॑ अस्य॒ साद॑ने॒ यवं॒ न वृ॒ष्टिर्दि॒व्येन॒ दानु॑ना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āpo na sindhum abhi yat samakṣaran somāsa indraṁ kulyā iva hradam | vardhanti viprā maho asya sādane yavaṁ na vṛṣṭir divyena dānunā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आपः॑ । न । सिन्धु॑म् । अ॒भि । यत् । स॒म्ऽअक्ष॑रन् । सोमा॑सः । इन्द्र॑म् । कु॒ल्याःऽइ॑व । ह्र॒दम् । वर्ध॑न्ति । विप्राः॑ । महः॑ । अ॒स्य॒ । साद॑ने । यव॑म् । न । वृ॒ष्टिः । दि॒व्येन॑ । दानु॑ना ॥ १०.४३.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:43» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:25» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आपः-न सिन्धुं यत्) जलप्रवाह-नदियाँ जैसे समुद्र के प्रति (कुल्याः-इव ह्रदम्) या जैसे नहरें बड़े जलाशय या बड़ी नदियों के प्रति (सम् अभि अक्षरन्) अभिलक्षित होकर बहती हैं, ऐसे ही (सोमासः-इन्द्रम्) उपासकों के उपासनारसप्रवाह परमात्मा के प्रति बहते हैं (सदने-अस्य महः) हृदय में इस महान् परमात्मा को (विप्राः-वर्धन्ति) उपासक बढ़ाते हैं-साक्षात् करते हैं (वृष्टिः-दिव्येन दानुना यवं न) या जैसे वर्षणशील मेघ जलप्रदान से खेती के अन्न को बढ़ाता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - नदियाँ जैसे समुद्र को और नहरें जैसे बड़े जलाशय अथवा नदी को प्राप्त होती हैं, ऐसे ही उपासकों के उपासनाप्रवाह परमात्मा को प्राप्त होते हैं और वे उपासनाप्रवाह उपासकों के अन्दर परमात्मा को प्रवृद्ध करते हैं, जैसे मेघजल से खेती के अन्न प्रवृद्ध होते हैं ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तेजस्विता - संवर्धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष के पास (सोमासः) = सोमकण उसी प्रकार पहुँचते हैं (न) = जैसे कि (आपः) = जल (सिन्धुं अभि) = समुद्र की ओर (समक्षरन्) = संचालित होते हैं और (इव) = जैसे (कुल्या:) = जलधाराएँ (हृदम्) = एक सरोवर के समीप पहुँचती हैं, तो (अस्य) = इस सोम के (सादने) = शरीर में स्थापित करने पर (विप्रा:) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले लोग (महः) = अपनी तेजस्विता को (वर्धन्ति) = बढ़ाते हैं । उसी प्रकार बढ़ाते हैं (न) = जैसे कि (वृष्टि:) = वर्षा (दिव्येन दानुना) = इस दिव्य, अन्तरिक्ष से होनेवाले जल के दान से (यवम्) = जौ को बढ़ाती है। वर्षा दिव्य जल से जौ को बढ़ाती है और विप्र लोग सोम के धारण से तेजस्विता को बढ़ाते हैं । [२] समुद्र जलों का आधार है इसी प्रकार हम इन्द्र बनकर सोम के आधार बनें। इस सोम के रक्षण से ही हम तेजस्वी बनेंगे। इस तेजस्विता से ही सब कमियों को दूर करके हम विप्र होंगे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम सोम को शरीर में प्रतिष्ठित करके तेजस्वी बनें और सब न्यूनताओं को दूर करके विप्र हों, अपना पूरण करनेवाले हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आपः न सिन्धुं यत्) जलप्रवाहा नद्यः समुद्रं प्रति यथा (कुल्याः-इव ह्रदम्) नदीकुले भवाः कृत्रिमा अल्पनद्यः “अल्पनद्यः-निर्मिता जलगमनमार्गाः” [ऋ० ५।८३।८ दयानन्दः] यथा महान्तं जलाशयम् (समभ्यक्षरन्) अभिलक्ष्य संवहन्ति, तद्वत् (सोमासः-इन्द्रम्) उपासकानामुपासनाप्रवाहाः परमात्मानमभिलक्ष्य संवहन्ति सम्प्राप्ता भवन्ति, नान्यथा भवन्ति  (सदने-अस्य महः) सदने हृदये ‘अस्य’-इमम् ‘विभक्तिव्यत्ययेन’ महान्तं परमात्मानमभिलक्ष्य (विप्राः-वर्धन्ति) उपासकविद्वांसो वर्धयन्ति-प्रवृद्धं कुर्वन्ति (वृष्टिः दिव्येन दानुना यवं न ) यद्वा यथा वर्षणशीलो मेघः “वृषु सेचने” [भ्वादिः] ‘ततः क्तिच् कर्त्तरि तथा कृत्वाऽन्तोदात्तः’ आकाशभवेन जलप्रदानेनान्नं वर्धयन्ति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - As rivers flow into the sea, as streams of rain flow into the lake, so do the beauties of faith and pleasure in soma yajnas concentrate on Indra, glory of the world. As showers of rain with profuse divine generosity raise the crops of barley and the plants grow up in ecstasy, so in the homely presence of this generous lord of sublimity, saints and sages rise and shine in moral and spiritual grandeur.