पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मघवा) = सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का स्वामी प्रभु (विशं विशम्) = प्रत्येक प्रजा में (पर्यशायत) = निवास करता है। प्रभु में ही सारी प्रजाओं का निवास है और वे प्रभु ही सब प्रजाओं में वस रहे हैं। [२] (वृषा) = वे सब सुखों के वर्षण करनेवाले प्रभु (जनानाम्) = लोगों के साथ सम्बद्ध (धेनाः) = ज्ञान की वाणियों को (अवचाकशत्) = हृदयस्थ-रूपेण उपदिष्ट करते हैं। [कश गतिशासनयो: ] । इन वाणियों के अनुसार कार्यों को व्यवस्थित करने पर ही हमारे कल्याण का निर्भर है । [३] (अह) = अब (शक्रः) = इन्द्र - सर्वशक्तिमान् प्रभु (यस्य) = जिस व्यक्ति के (सवनेषु) = यशों में (रण्यति) = आनन्द का अनुभव करते हैं (स) = वह (तीव्रैः) = प्रबल (सोमैः) = सोमकणों के द्वारा (पृतन्यतः) = आधि-व्याधियों के रूप में आक्रमण करनेवाली वासनाओं को सहते पराभूत करता है, कुचल देता है । वासनाओं को जीतकर वह शरीर और मन में स्वस्थ बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु सब के हृदयों में निवास करते हैं, ज्ञान की वाणियों का उपदेश करते हैं । उनके अनुसार यज्ञशील होने पर हम सोम का रक्षण कर पाते हैं। इन तीव्र सोमकणों से हम रोगादि को जीत पाते हैं। शरीर व्याधिशून्य होता है तो मन आधियों से शून्य ।