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देवता: इन्द्र: ऋषि: कृष्णः छन्द: जगती स्वर: निषादः

वि॒षू॒वृदिन्द्रो॒ अम॑तेरु॒त क्षु॒धः स इद्रा॒यो म॒घवा॒ वस्व॑ ईशते । तस्येदि॒मे प्र॑व॒णे स॒प्त सिन्ध॑वो॒ वयो॑ वर्धन्ति वृष॒भस्य॑ शु॒ष्मिण॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viṣūvṛd indro amater uta kṣudhaḥ sa id rāyo maghavā vasva īśate | tasyed ime pravaṇe sapta sindhavo vayo vardhanti vṛṣabhasya śuṣmiṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि॒षु॒ऽवृत् । इन्द्रः॑ । अम॑तेः । उ॒त् । क्षु॒धः । सः । इत् । रा॒यः । म॒घऽवा॑ । वस्वः॑ । ई॒श॒ते॒ । तस्य॑ । इ॒मे । प्र॒व॒णे । स॒प्त । सिन्ध॑वः । वयः॑ । व॒र्ध॒न्ति॒ । वृ॒ष॒भस्य॑ । शु॒ष्मिणः॑ ॥ १०.४३.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:43» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:24» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः-इन्द्रः) वह परमात्मा (विषुवृत्) विषम अर्थात् कुटिलों को दबाता है, हटा देता है, वह (अमतेः-उत क्षुधः) अज्ञान और भोगेच्छा को भी निवृत्त करता है (मघवा-इत्-रायः-वस्वः-ईशते) वह ऐश्वर्यवान् परमात्मा बाह्यधन का और बसानेवाले आन्तरिक धन-आत्मबल का स्वामी है (तस्य वृषभस्य शुष्मिणः-इत्-प्रवणे) उस सुखवर्षक बलवान् परमात्मा के शासन में (इमे सप्त सिन्धवः) ये सर्पणशील प्राण या नदियाँ (वयः-वर्धन्ति) जीवन और अन्न को बढ़ाते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा कुटिलों पर कृपा नहीं करता। उनको किसी न किसी ढंग से दण्ड देता है। अज्ञान और बहुत भोगेच्छा को भी निवृत्त करता है। समस्त बाहरी और आन्तरिक धन का स्वामी है। उसी के शासन से नदियाँ प्रवाहित होती हुई अन्न को बढ़ाती हैं और उसी में प्राण प्रगति करते हुए जीवन को बढ़ाते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुमति, नकि अमति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला प्रभु (अमतेः) = निन्दित बुद्धि का (विषूवृत्) = [विश्वग् वर्तकः] इधर उधर फेंक देनेवाला हो, हमारे से अमति को दूर करनेवाला हो । अमति नष्ट होकर, सुमति हमें प्राप्त हो । (उत) = और प्रभु हमारी (क्षुधः) = भूख के भी विषूवृत् हों, हमारी भूख का भी प्रतीकार करनेवाले हों । (स मघवा इत्) = वे सम्पूर्ण ऐश्वर्योंवाले प्रभु ही (वस्व रायः) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले धन का (ईशते) = स्वामित्व करते हैं, प्रभु ही सब धनों के मालिक हैं । इन धनों को देकर प्रभु ने ही हमारी क्षुधा का प्रतीकार करना है । [२] क्षुधा के प्रतीकार के लिये साधनभूत अन्नों का उत्पादन भी उस प्रभु की व्यवस्था से होता है। (वृषभस्य) = सब सुखों का वर्षण करनेवाले (शुष्मिणः) = शक्तिशाली (तस्य) = उस प्रभु के ही (प्रवणे) = [srefnission] प्रशासन में (इमे) = ये (सप्त) = सर्पणशील [सप्त-सृप्त] अथवा प्रभु के प्रशासन को माननेवाली [सप् to obey] (सिन्धवः) = नदियाँ (वयः) = अन्न को (वर्धन्ति) = बढ़ाती हैं । प्रभु ने सूर्य किरणों द्वारा जल के वाष्पी भवन, व ऊपर आकर शीत प्रदेश में घनी भवन की व्यवस्था से वृष्टि का प्रबन्ध किया है। उसी से नदियों का प्रवाह होता है। पूर्व से पश्चिम में व उत्तर से दक्षिण में, सब दिशाओं में ये नदियाँ प्रभु के प्रशासन में ही बह रही हैं और विविध भूभागों को खींचती हुईं ये अन्न के उत्पादन का कारण बनती हैं। एवं प्रभु ने अन्नोत्पादन द्वारा हमारी क्षुधा का प्रतीकार किया है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारी कुमति को दूर करते हैं, क्षुधा के प्रतीकार के लिये अन्नोत्पादन की व्यवस्था करते हैं ।
अन्य संदर्भ: सूचना - यहाँ 'सप्त' का अर्थ 'सात' समझकर पंजाब की भौगोलिक स्थिति का संकेत लेना ठीक नहीं। इसी से पाश्चात्त्यों को ऋग्वेद के पञ्जाब में ही बनाये जाने का भ्रम हो गया। 'सप्त' का वस्तुतः यहाँ अर्थ 'सर्पणशील' व 'प्रभु - प्रशासन को माननेवाली' ही है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः इन्द्रः) स परमात्मा (विषुवृत्) विषमान् खल्वसरलान् वृणोति-आच्छादयति निवारयति वा सः ‘विषुरूपे विषमरूपे” [निरु० १२।२८] (अमतेः-उत क्षुधः) अज्ञानस्यापि चाशनायाश्च निवारकः (मघवा-इत्-रायः-वस्वः ईशते) स ऐश्वर्यवान् परमात्मा हि बाह्यधनस्य तथा वासयितुरात्मबलस्याध्यात्मैश्वर्यस्य चेष्टे स्वामित्वं करोति (वृषभस्य शुष्मिणः-तस्य इत् प्रवणे) तस्यैव सुखवर्षयितुर्बलवतः परमात्मनो निम्ने शासने (इमे सप्त सिन्धवः) एते सर्पणशीलाः प्राणा नद्यो वा “प्राणो वै सिन्धुश्छन्दः” [श० ८।५।२।४] (वयः-वर्धन्ति) जीवनमन्नं वा वर्धयन्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of all power and glory, dynamic presence all round in the world, dispels hunger and ignorance, rules and dispenses wealth, power and peace of shelter and settlement. Indeed, under the rule of this mighty generous master, all these seven streams of nature, life and living energy flow on and evolve to perfection. (This is true of both the external world of nature under the law of the cosmic spirit and of the internal world of mind and pranic energy under the rule of the spirit within.)