पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला प्रभु (अमतेः) = निन्दित बुद्धि का (विषूवृत्) = [विश्वग् वर्तकः] इधर उधर फेंक देनेवाला हो, हमारे से अमति को दूर करनेवाला हो । अमति नष्ट होकर, सुमति हमें प्राप्त हो । (उत) = और प्रभु हमारी (क्षुधः) = भूख के भी विषूवृत् हों, हमारी भूख का भी प्रतीकार करनेवाले हों । (स मघवा इत्) = वे सम्पूर्ण ऐश्वर्योंवाले प्रभु ही (वस्व रायः) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले धन का (ईशते) = स्वामित्व करते हैं, प्रभु ही सब धनों के मालिक हैं । इन धनों को देकर प्रभु ने ही हमारी क्षुधा का प्रतीकार करना है । [२] क्षुधा के प्रतीकार के लिये साधनभूत अन्नों का उत्पादन भी उस प्रभु की व्यवस्था से होता है। (वृषभस्य) = सब सुखों का वर्षण करनेवाले (शुष्मिणः) = शक्तिशाली (तस्य) = उस प्रभु के ही (प्रवणे) = [srefnission] प्रशासन में (इमे) = ये (सप्त) = सर्पणशील [सप्त-सृप्त] अथवा प्रभु के प्रशासन को माननेवाली [सप् to obey] (सिन्धवः) = नदियाँ (वयः) = अन्न को (वर्धन्ति) = बढ़ाती हैं । प्रभु ने सूर्य किरणों द्वारा जल के वाष्पी भवन, व ऊपर आकर शीत प्रदेश में घनी भवन की व्यवस्था से वृष्टि का प्रबन्ध किया है। उसी से नदियों का प्रवाह होता है। पूर्व से पश्चिम में व उत्तर से दक्षिण में, सब दिशाओं में ये नदियाँ प्रभु के प्रशासन में ही बह रही हैं और विविध भूभागों को खींचती हुईं ये अन्न के उत्पादन का कारण बनती हैं। एवं प्रभु ने अन्नोत्पादन द्वारा हमारी क्षुधा का प्रतीकार किया है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारी कुमति को दूर करते हैं, क्षुधा के प्रतीकार के लिये अन्नोत्पादन की व्यवस्था करते हैं ।
अन्य संदर्भ: सूचना - यहाँ 'सप्त' का अर्थ 'सात' समझकर पंजाब की भौगोलिक स्थिति का संकेत लेना ठीक नहीं। इसी से पाश्चात्त्यों को ऋग्वेद के पञ्जाब में ही बनाये जाने का भ्रम हो गया। 'सप्त' का वस्तुतः यहाँ अर्थ 'सर्पणशील' व 'प्रभु - प्रशासन को माननेवाली' ही है ।