पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले प्रभो ! (त्वद्रिग्) = [त्याग् अञ्चति] आपकी ओर जानेवाला (मे मनः) = मेरा मन (घा) = निश्चय से (न अपवेति) = दूर नहीं जाता है। एक बार मन प्रभु की ओर गया तो वह वहाँ उलझ ही जाता है, न उस प्रभु के ओर-छोर को वह मन देख पाता है और न वहाँ से हटता है। (ते इत्) = आप में ही (कामम्) = अपनी अभिलाषा को (शिश्रय) = मैं स्थापित करता हूँ। मुझे आपकी प्राप्ति की ही प्रबल कामना है। [२] (दस्म) = हे सब दुःखों के विनाशक प्रभो ! आप (बर्हिषि) = मेरे वासनाशून्य हृदय में (राजा इव) = राजा की तरह (अधिनिषदः) = निषण्ण होइये । आपकी प्रेरणा के अनुसार ही मेरा जीवन चले, आप मेरे जीवन को शासित करनेवाले हों । आपके द्वारा ही मेरे जीवन की प्रत्येक क्रिया व्यवस्थित हो [राज् to regnlete ] । आप ही हृदय में स्थित होकर उसे प्रकाश से दीप्त करनेवाले हों [राजू दीप्तौ] । आपके प्रकाश में मैं अपने कर्त्तव्य कर्मों को करता हुआ भटकूँ नहीं। [३] हे प्रभो ! (अस्मिन्) = इस सोमे शरीर में उत्पन्न सोम शक्ति के विषय में (ते) = आपकी प्राप्ति के लिये अवपानं अस्तु पुनः शरीर में ही पी लेना, रुधिर में उसका फिर से व्याप्त कर देना हो। इस सोम को शरीर में ही व्याप्त कर देनेवाले बनें। शरीर में इसकी उत्पत्ति हुई है, यह फिर से वहीं व्याप्त हो जाए। इस प्रकार इसके व्यापन से ही मेरा शरीर स्वस्थ होगा, मन निर्मल होगा और बुद्धि तीव्र होकर आपके दर्शन योग्य बनेगी। आपकी प्राप्ति के लिये इस सोम का रक्षण आवश्यक है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मेरा मन प्रभु में लीन हो जाए, हृदयस्थ प्रभु मेरे राजा हों, सोमरक्षण के द्वारा सूक्ष्म बनी हुई हुई बुद्धि प्रभु दर्शन का साधन बने।