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देवता: इन्द्र: ऋषि: कृष्णः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

बृह॒स्पति॑र्न॒: परि॑ पातु प॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः । इन्द्र॑: पु॒रस्ता॑दु॒त म॑ध्य॒तो न॒: सखा॒ सखि॑भ्यो॒ वरि॑वः कृणोतु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bṛhaspatir naḥ pari pātu paścād utottarasmād adharād aghāyoḥ | indraḥ purastād uta madhyato naḥ sakhā sakhibhyo varivaḥ kṛṇotu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृ॒हस्पतिः॑ । नः॒ । परि॑ । पा॒तु॒ । प॒श्चात् । उ॒त । उत्ऽत॑रस्मात् । अध॑रात् । अ॒घ॒ऽयोः । इन्द्रः॑ । पु॒रस्ता॑त् । उ॒त । म॒ध्य॒तः । नः॒ । सखा॑ । सखि॑ऽभ्यः । वरि॑ऽवः । कृ॒णो॒तु॒ ॥ १०.४३.११

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:43» मन्त्र:11 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:25» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:11


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) वेदवाणी का स्वामी परमात्मा (अघायोः) हमारे प्रति पाप-अनिष्ट को चाहनेवाले से (नः पश्चात्-उत-उत्तरस्मात्) हमें पश्चिम की ओर से, उत्तर की ओर से (अधरात् परि पातु) और नीचे की ओर से बचावे (इन्द्रः) वही ऐश्वर्यवान् परमात्मा (पुरस्तात्-उत मध्यतः) पूर्वदिशा की ओर से और मध्य दिशा की ओर से भी रक्षा करे (सखा नः सखिभ्यः-वरिवः कृणोतु) मित्ररूप परमात्मा हम मित्रों के लिए धन प्रदान करे ॥११॥
भावार्थभाषाः - किसी भी दिशा में वर्त्तमान अनिष्टकारी से परमात्मा रक्षा करता है, जब कि हम सखासमान गुण आचरण को कर लेते हैं ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु विश्वास

पदार्थान्वयभाषाः - प्रस्तुत दोनों मन्त्र ४२.१० तथा ४२.११ पर व्याख्यात हो चुके हैं। 'सत्पति' बनने के लिये गोदुग्ध व जौ का प्रयोग आवश्यक है और उस बृहस्पति प्रभु में विश्वास आवश्यक है । सूक्त के प्रारम्भ में कहा है कि हमारी मतियाँ प्रभु का आलिंगन करनेवाली बनें, [१] हमारा मन प्रभु प्रवण हो, [२] हमारी सुमति हो, न कि कुमति, [३] हमें आर्य-ज्योति प्राप्त हो, [४] सूर्यलोक का विजय करके हम ब्रह्मलोक को प्राप्त करें, [५] इस लोक में सोमरक्षण के द्वारा शत्रुओं का मर्षण करनेवाले हों, [६] इस सोमरक्षण से तेजस्विता का संवर्धन करें, [७] 'सुन्वन्, जीरदानु, मनु व हविष्मान्' बनकर ज्योति को प्राप्त करें, [८] सत्पति बनें, [९] सत्पति बनने के लिये आवश्यक है कि हम 'स्वपति' हों-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) वेदवाण्याः स्वामी परमात्मा (अघायोः) पापकामिनोऽनिष्टेच्छुकात् (पश्चात्-उत उत्तरस्मात्-अधरात्-नः परिपातु) पश्चिमतोऽप्युत्तरतो दक्षिणतश्चास्मान् रक्षतु (इन्द्रः) स ऐश्वर्यवान् परमात्मा (पुरस्तात्-उत मध्यतः) पूर्वदिक्तो मध्यतश्च रक्षतु (सखा नः सखिभ्यः-वरिवः कृणोतु) स एव सखिभूतः परमात्माऽस्मभ्यं सखिभूतेभ्यो धनप्रदानं करोतु “वरिवः धननाम” [निघ० २।१०] ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May Brhaspati, lord of Infinity and the master of knowledge protect us against the violence of sin and sinners upfront, behind, above or below. May Indra, ruler and friend of humanity, create and lead us to the wealth of life for us and our friends, all at present and in our midst.