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अच्छा॑ म॒ इन्द्रं॑ म॒तय॑: स्व॒र्विद॑: स॒ध्रीची॒र्विश्वा॑ उश॒तीर॑नूषत । परि॑ ष्वजन्ते॒ जन॑यो॒ यथा॒ पतिं॒ मर्यं॒ न शु॒न्ध्युं म॒घवा॑नमू॒तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

acchā ma indram matayaḥ svarvidaḥ sadhrīcīr viśvā uśatīr anūṣata | pari ṣvajante janayo yathā patim maryaṁ na śundhyum maghavānam ūtaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अच्छ॑ । मे॒ । इन्द्र॑म् । म॒तयः॑ । स्वः॒ऽविदः॑ । स॒ध्रीचीः॑ । विश्वाः॑ । उ॒श॒तीः । अ॒नू॒ष॒त॒ । परि॑ । स्व॒ज॒न्ते॒ । जन॑यः । यथा॑ । पति॑म् । मर्य॑म् । न । शु॒न्ध्युम् । म॒घऽवा॑नम् । ऊ॒तये॑ ॥ १०.४३.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:43» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:24» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में ‘इन्द्र’ शब्द से परमात्मा लक्षित है। वह अपने उपासकों की स्तुतियों से प्रसन्न होकर उनकी बाधाओं को दूर करता है, सुखों को देता है, उनके अन्दर साक्षात् होता है, यह वर्णित है।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (मे) मेरी (स्वर्विदः सध्रीचीः-विश्वाः-मतयः) मोक्ष प्राप्त करानेवाली परस्पर सहयोग सङ्गत हुई सब वाणियाँ (उशतीः-अच्छ-अनूषत) तुझे चाहती हुई स्तुति करती हैं, उसके द्वारा (यथा जनयः-मर्यं पतिं न) जैसे भार्याएँ-पत्नियाँ अपने पुरुष पति को एवं (शुन्ध्युं मघवानम्-ऊतये परिष्वजन्ते) पवित्रकर्त्ता तुझ अध्यात्म धनवाले को आत्मतृप्ति के लिए स्तोताजन आलिङ्गित करते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य की वाणियाँ जो परमात्मा की स्तुति करनेवाली हैं, परमात्मा का समागम कराने-मोक्ष प्राप्त कराने की परम साधन हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु का आलिंगन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत सूक्त का ऋषि कृष्ण आंगिरस ही प्रार्थना करता है कि (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की (अच्छा) = ओर (स्वर्विदः) = प्रकाश को प्राप्त करनेवाली (मे) = मेरी (मतयः) = बुद्धियाँ प्रवृत्त हों (सध्रीची:) = उस प्रभु के साथ गति करनेवाली (विश्वाः) = प्रभु-स्तवन को ही व्याप्त करनेवाली (उशती:) = प्रभु प्राप्ति की प्रबल कामनावाली ये मेरी बुद्धियाँ प्रभु को ही (अनूषत) = स्तुत करनेवाली हों । प्रभु-स्तवन में ही प्रकाश है। प्रभु से हम दूर होते हैं और अन्धकार में पहुँच जाते हैं । [२] (यथा न) = और जैसे [न च] (जनयः) = पत्नियाँ (शुन्ध्युं मर्यं) = पतिम् शुद्ध जीवनवाले मनुष्य पति को (परिष्वजन्ते) = आलिंगन करती हैं उसी प्रकार मेरी बुद्धियाँ उस (मघवानम्) = सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के स्वामी प्रभु का ऊतये रक्षण के लिये आलिंगन करनेवाली हों । अर्थात् मैं सदा प्रभु का स्मरण करनेवाला बनूँ, प्रभु स्मरणपूर्वक ही इस जीवन-संग्राम में चलने का यत्न करूँ। मेरी बुद्धियाँ सदा प्रभु के साथ हों [सध्रीची:], उसीके स्तवन का व्यापन करनेवाली हों [विश्वाः] प्रभु प्राप्ति की प्रबल कामनावाली हों [उशती: ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मेरा ध्यान प्रभु की ओर हो । सांसारिक क्रियाओं को करता हुआ मैं प्रभु को भूल न जाऊँ ।
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ब्रह्ममुनि

सूक्तेऽस्मिन् ‘इन्द्र’ शब्देन परमात्मा गृह्यते। स स्वोपासकानां स्तुतिभिः प्रीयमाणः सर्वविधबाधा दूरीकरोति बहूनि सुखानि तेभ्यः प्रयच्छति तदनन्तरं साक्षाद् भवतीति प्रदर्श्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (मे) मम (स्वर्विदः सध्रीचीः-विश्वाः-मतयः) सुखं मोक्षं प्रापयित्र्यः “स्वर्वित् सुखप्रापिकाः” [ऋ० १।९६।४ दयानन्दः] परस्पर सहयोगिन्यः सङ्गताः सर्वाः खलु वाचः “वाग्वै मतिः [श० ८।१।२।७] (उशतीः-अच्छ-अनूषत) त्वां कामयमानाः सम्यक् स्तुवन्ति “अनूषत-अस्तोषत” [निरु० ४।१९] “णु स्तुतौ” [अदादि०] ताभिः (यथा जनयः मर्यं पतिं नः) भार्या यथा मनुष्यं पतिमिव-एवम् (शुन्ध्युं मघवानं परिष्वजन्ते-ऊतये) पवित्रकर्तारमध्यात्मधनवन्तं त्वामात्मतृप्तये स्तोतारः परिष्वजन्ते-आलिङ्गन्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - All my thoughts, words and actions, all together in perfect unison concentrated on the love and light of divinity, ecstatically adore and celebrate Indra, lord almighty of existence. Just as wives with love embrace their human lover, protector and husband, so do my prayers centre on Indra, lord of glory, power and purity, for all round protection, promotion and well being.