पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले प्रभो ! (यः) = जो आपका (उग्रः) = तीव्र (शम्बः) = वज्र है (तेन) = उस शत्रुओं को शान्त [समाप्त] करनेवाले वज्र से (आरात् शत्रुम्) = इस समीप आनेवाले शत्रु को (दूरं अपबाधस्व) = सुदूर विनष्ट करनेवाले होइये । प्रभु ने हमें क्रियाशीलता रूप वज्र दिया हुआ है, इसी से हमने वासना को विनष्ट करना है। [२] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (अस्मे) = हमारे लिये आप (यवमत्) = जौवाले व (गोमत्) = गौवेंवाले, गोदुग्ध से युक्त अन्न को (धेहि) = धारण करिये। जौ इत्यादि अन्नों से हमारे में प्राणशक्ति का वर्धन होगा और गोदुग्ध से हमें सात्त्विक बुद्धि प्राप्त होगी। [३] हे प्रभो ! (जरित्रे) = स्तोता के लिये (वाजरत्नाम्) = रमणीय शक्तियोंवाली (धियम्) = बुद्धि को (कृधी) = करिये आपका स्तोता जहाँ बुद्धि को प्राप्त करे वहाँ उसे रमणीय शक्तियाँ भी प्राप्त हों । शक्तियों की रमणीयता इसी में है कि वह रक्षा के कार्य में विनियुक्त होती है, ध्वंस के कार्य में नहीं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम क्रियाशीलता के द्वारा वासना को नष्ट करें। जौ व गोदुग्ध का प्रयोग करते हुए रमणीय शक्ति व बुद्धि को प्राप्त करें।