पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो भी पुरुष (प्रयस्वान्) = [प्रयस् - हवि = sacrifice ] त्याग की वृत्तिवाला बनकर (अस्मै) = इस प्रभु के लिये, प्रभु की प्राप्ति के लिये (धनम्) = धन को जो (स्पन्द्रं न) = चञ्चल-सा है, अस्थिर है तथा बहुलम् - जीवन के लिये कृष्णपक्ष के समान है, जीवन को अन्धकारमय बना देता है, उस धन को (आसुनोति) = [to perform a shcrifice ] यज्ञ के लिये विनियुक्त करता है। और जो (प्रयस्वान्) = [प्रय: = food] प्रशस्त [सात्त्विक] भोजनवाला बनकर (तीव्रान्) = शक्तिशाली, रोगकृमियों व मन की मैल का संहार करनेवाले (सोमान्) = सोमकणों को (आसुनोति) = शरीर में उत्पन्न करता है । (तस्मै) = उस पुरुष के लिये वे प्रभु (अह्नः प्रातः) = दिन के प्रारम्भ होते ही (शत्रून्) = कामादि शत्रुओं को (सुतुकान्) = [सुप्रेरणान् सा० ] पूरी तरह से भाग जानेवालों को करते हैं और (स्वष्ट्रान्) = [उत्तमायुधान्, अष्ट्रा good] उत्तम शस्त्रोंवाले इन शत्रुओं को नि न्युवति निश्चय से इनसे पृथक् कर देता है और (वृत्रं हन्ति) = वासना को नष्ट कर देता है। [२] [क] त्यागवाले बनकर हम धन को यज्ञों में विनियुक्त करें। ये धन अस्थिर हैं, इनसे ममता क्या करनी ! और ये धन हमारी अवनति का कारण बनते हैं, ये जीवन के कृष्णपक्ष के समान हैं। [ख] धन के त्याग के साथ हमारा दूसरा कर्त्तव्य यह है कि उत्तम अन्नों के सेवन से शरीर में सोम का उत्पादन करें। यह सोम हमारे शरीरों को नीरोग बनायेगा, मनों को निर्मल करेगा। [ग] ऐसा होने पर हमारे काम-क्रोधादि शत्रु भाग खड़े होंगे [take to one is heels] । कामादि के अस्त्र हमारे लिये कुण्ठित हो जायेंगे । हमारी वासनाओं का विनाश हो जाएगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम धन को यज्ञों में लगाएँ, सोम [वीर्य] का उत्पादन करें, इसी से शत्रुओं का नाश होगा।