हविष्मान् का मित्र 'प्रभु'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = शत्रुओं का संहार करनेवाले प्रभो ! (समीके) = संग्राम में (सन्तस्थाना:) = सम्यक् स्थित हुए - हुए (जनाः) = लोग (मम सत्येषु) = ' मेरा पक्ष सत्य है, मेरा पक्ष सत्य है' इस प्रकार के विचारवाले संग्रामों में (त्याम्) = आपको (विह्वयन्ते) = पुकारते हैं। दोनों ही पक्ष अपने को सत्य पर आरूढ़ समझ रहे होते हैं। दोनों में कोई भी अपने को गलती में नहीं समझता। [२] (अत्रा) = इस प्रकार के विचारवाले ने इन संग्रामों के उपस्थित होने पर (यः हविष्मान्) = जो हविवाला होता है, त्याग की वृत्तिवाला होता है, वही उस प्रभु को (यजुं कृणुते) = अपना साथी बना पाता है। (असुन्वता) = अयज्ञशील पुरुष के साथ (शूरः) = सब शत्रुओं के शीर्ण करनेवाले वे प्रभु (सख्यम्) = मित्रता को (न वष्टि) = नहीं चाहते हैं । त्याग की वृत्ति ही वस्तुतः मनुष्य को असत्य से ऊपर उठाकर सत्यपक्ष में स्थापित करती है और प्रभु इस सत्यपक्षवाले को ही विजयी बनाते हैं। संग्रामों में विजय उन्हीं की होती है जो (हविष्मान्) = बनते हैं, जिस जाति में त्याग की भावना नहीं वह अवश्य पराजित हो जाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम हविष्मान् बनें, प्रभु हमें विजयी बनायेंगे ।