वांछित मन्त्र चुनें

त्वां जना॑ ममस॒त्येष्वि॑न्द्र संतस्था॒ना वि ह्व॑यन्ते समी॒के । अत्रा॒ युजं॑ कृणुते॒ यो ह॒विष्मा॒न्नासु॑न्वता स॒ख्यं व॑ष्टि॒ शूर॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ janā mamasatyeṣv indra saṁtasthānā vi hvayante samīke | atrā yujaṁ kṛṇute yo haviṣmān nāsunvatā sakhyaṁ vaṣṭi śūraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम् । जनाः॑ । म॒म॒ऽस॒त्येषु॑ । इ॒न्द्र॒ । स॒म्ऽत॒स्था॒नाः । वि । ह्व॒य॒न्ते॒ । स॒म्ऽई॒के । अत्र॑ । युज॑म् । कृ॒णु॒ते॒ । यः । ह॒विष्मा॑न् । न । असु॑न्वता । स॒ख्यम् । व॒ष्टि॒ । शूरः॑ ॥ १०.४२.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:42» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:22» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्ययुक्त परमात्मन् ! (त्वाम्) तुझे (सन्तस्थानाः-जनाः) स्पर्धा में स्थित विरोधी जन (ममसत्येषु) मेरा सत्य कर्तव्य है जिन प्रसङ्गों में, उनमें, तथा (समीके) संग्राम में (वि ह्वयन्ते) विशेषरूप से आह्वान करते हैं (अत्र) इनमें-वहाँ (शूरः) वह प्राप्त होनेवाला परमात्मा (युजं कृणुते) मुझे सहयोगी सखा बनाता है (यः-हविष्मान्) आत्मसमर्पण कर चुका या करता है, ऐसे स्तुति करनेवाले को परमात्मा मित्र बनाता है और (असुन्वता सख्यं न वष्टि) जो उपासनारस का सम्पादन नहीं करता उसके साथ परमात्मा मित्रता नहीं चाहता ॥४॥
भावार्थभाषाः - मानव के सामने आनेवाले विरोधी जन संघर्ष लेने के लिए आह्वान करें। संग्राम में भले ही धकेलना चाहें, परन्तु उपासक-परमात्मा की स्तुति करनेवाले को घबराने की आवश्यकता नहीं। उसकी सहायता परमात्मा करता है ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हविष्मान् का मित्र 'प्रभु'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = शत्रुओं का संहार करनेवाले प्रभो ! (समीके) = संग्राम में (सन्तस्थाना:) = सम्यक् स्थित हुए - हुए (जनाः) = लोग (मम सत्येषु) = ' मेरा पक्ष सत्य है, मेरा पक्ष सत्य है' इस प्रकार के विचारवाले संग्रामों में (त्याम्) = आपको (विह्वयन्ते) = पुकारते हैं। दोनों ही पक्ष अपने को सत्य पर आरूढ़ समझ रहे होते हैं। दोनों में कोई भी अपने को गलती में नहीं समझता। [२] (अत्रा) = इस प्रकार के विचारवाले ने इन संग्रामों के उपस्थित होने पर (यः हविष्मान्) = जो हविवाला होता है, त्याग की वृत्तिवाला होता है, वही उस प्रभु को (यजुं कृणुते) = अपना साथी बना पाता है। (असुन्वता) = अयज्ञशील पुरुष के साथ (शूरः) = सब शत्रुओं के शीर्ण करनेवाले वे प्रभु (सख्यम्) = मित्रता को (न वष्टि) = नहीं चाहते हैं । त्याग की वृत्ति ही वस्तुतः मनुष्य को असत्य से ऊपर उठाकर सत्यपक्ष में स्थापित करती है और प्रभु इस सत्यपक्षवाले को ही विजयी बनाते हैं। संग्रामों में विजय उन्हीं की होती है जो (हविष्मान्) = बनते हैं, जिस जाति में त्याग की भावना नहीं वह अवश्य पराजित हो जाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम हविष्मान् बनें, प्रभु हमें विजयी बनायेंगे ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (त्वाम्) त्वां खलु (सन्तस्थानाः-जनाः) साम्मुख्ये स्थिता विरोधिनो जनाः (ममसत्येषु) मम सत्यं येषु कर्त्तव्यं स्यादिति प्रसङ्गेषु, अपि वा (समीके) सम्यक् प्राप्ते संग्रामे “समीके संग्रामनाम” [निघ० २।१७] (विह्वयन्ते) विशिष्टतयाऽऽह्वयन्ति (अत्र) अस्मिन् तत्र (शूरः) सः प्रापणशीलः परमात्मा (युजं कृणुते) सहयोगिनं सखायं करोति (यः-हविष्मान्) आत्मसमर्पणं कृतवान् स्तुतिं कृत्वा (असुन्वता सख्यं न वष्टि) उपासनारसमसम्पादयता सह स मित्रत्वं नेच्छति ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, people invoke you for help in contests of righteousness and call upon you while they march to the battle. Here too, however, he alone wins his help who offers faith and yajna, because the mighty one does not love, nor recognise, the friendship of the selfish and the non-performer of Soma-yajna.