पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार पवित्र जीवन बितानेवाले व्यक्ति ने प्रभु पर पूर्ण विश्वास के साथ चलना है । वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि (बृहस्पतिः) = आकाशादि विस्तृत लोकों का पति वह प्रभु [बृहतां पतिः ] (नः) = हमें (पश्चात्) = पीछे से (उत) = और (पुरस्तात्) = सामने से [ पूर्व व पश्चिम से] (परिपातु) = पूर्णरूप से रक्षित करे । (इन्द्रः) = वह सब शत्रुओं का संहार करनेवाला प्रभु (उत्तरस्मात्) = उत्तर से तथा (अधरात्) = दक्षिण से (अधायो:) = अघ व पाप की कामनावाले पुरुष से (नः) = हमें (परिपातु) = रक्षित करे। (उत) = और (मध्यतः) = मध्य में से भी वे प्रभु हमारा रक्षण करें। प्रभु के रक्षण में मैं निरन्तर उन्नतिपथ पर आगे बढ़नेवाला बनूँ। [२] (सखा) = हम सबका वह सर्वमहान् मित्र (सखिभ्यः) = हम मित्रों के लिये (वरिवः) = धन को कृणोतु करे । जीवनयात्रा के लिये आवश्यक धन को वे प्रभु प्राप्त कराएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही हमें पापों से व निर्धनता से बचाते हैं । इस सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से हुआ है कि हम विद्या व प्रभु स्मरण को अपना व्यसन बना लें तो अन्य व्यसनों से बचे रहेंगे, [१] हम ज्ञानधेनु का दोहन करें और प्रभु के प्रकाश को प्राप्त करने का यत्न करें, [२] हम भोजन की प्रार्थनाएँ न करते रहकर उत्तम बुद्धि की प्रार्थना करें, [३] वे प्रभु हविष्मान्-त्यागपूर्वक अदन करनेवाले के मित्र हैं, [४] हम 'धनों को यज्ञों में लगायें, शक्ति का उत्पादन करें' इसी से हम शत्रुओं का नाश कर सकेंगे, [५] हम लोकहित साधक धनों को ही प्राप्त करें, [६] गोदुग्ध व जौ के प्रयोग से रमणीय शक्ति व बुद्धि को प्राप्त करें, [७] सोमरक्षण हमारे जीवन के कृष्णपक्ष का अन्त करनेवाला हो, [८] हम देवकाम हों, [९] पवित्र जीवन से धनों को अपनी ओर आकृष्ट करें, [१०] प्रभु में पूर्ण विश्वास के साथ चलें, [११] हमारी बुद्धियाँ प्रभु-प्रवण हों-