पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो ! (युवं ह) = आप ही (कृशम्) = दुर्बल को, दुर्बल को ही क्या ! (युवम्) = आप तो (शयुम्) = जो रोगाकान्त होकर लेट ही गया है उस पुरुष को भी (उरुष्यथः) = रक्षित करते हो । प्राणापान की शक्ति के वर्धन से कृश फिर से मांसल [= बलवान्] हो जाता है और खाट पर पड़ा हुआ भी उठ बैठता है। [२] यह 'कृश' और 'शयु' आपसे रक्षित तभी होते हैं जब ये (विधन्तम्) = प्रभु का उपासन करनेवाले होते हैं । प्रभु की उपासना से इनका मन सबल बना रहता है और मन के सबल होने पर प्राणापानों के लिये शरीर के दोष दूर करने का उत्तम अवसर बना रहता है। प्रभु के उपासन से दूर होकर यदि मन विकल्पों से भर जाए तो फिर उस विकल्पग्रस्त पुरुष के लिये प्राणापान सहायक नहीं हो पाते। [३] (युवम्) = आप दोनों (सनिभ्यः) = संविभागपूर्वक खानेवालों के लिये और इस प्रकार हव्यवृत्ति से प्रभु का उपासन करनेवालों के लिये (स्तनयन्तम्) = गर्जना करते हुए, अर्थात् प्रबल होते हुए (सप्तास्यम्) = सात मुखोंवाले (व्रजम्) = व्यसन समूह को (अप ऊर्णुथः) = दूर ही रोक देते हो [उर्णुः अपवारणे] 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम् ' इस मन्त्र भाग में 'दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व मुख' ये सात ऋषि कहे गये हैं। क्योंकि ये ज्ञान प्राप्ति के साधनभूत हैं । परन्तु जब ये ज्ञान प्राप्ति के स्थान में विषयास्वाद में प्रसित हो जाते हैं तो ये ही 'सप्तास्य' बन जाते हैं। हमारा यह इन्द्रिय-समूह विषयों के भोगने में ही लग जाता है। यह 'सप्तास्य व्रज' प्रबल है, इसे जीत लेना सुगम नहीं। यही भाव 'स्तनयन्तं' शब्द से संकेतित हो रहा है। पर प्राणसाधना करने पर यह सप्तास्य व्रज हमारे से दूर रहता है और हम 'सप्तर्षियों' वाले ही बने रहते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणापान 'कृश व शयु' को भी प्राणशक्ति सम्पन्न बना देते हैं। ये हमारी इन्द्रियों को विषय-भोग-प्रवण नहीं होने देते ।