पदार्थान्वयभाषाः - [१] (युवम्) = आप दोनों (मृगा इव) = मृगों के समान हो 'मृग = to hurt, chese, pwrsue', दोषों का शिकार करनेवाले हो । (वारणा) = दोषों का निवारण करके शरीर को स्वस्थ बनाते हो । [२] (मृगण्यवः) = ' मृग अन्वेषणे ' = आत्मतत्त्व का अन्वेषण करनेवाले हम (दोषा वस्तोः) = दिन-रात (हविषा) = दानपूर्वक अदन से (निह्वयामहे) = आपको पुकारते हैं । प्राणापान की साधना के लिये युक्ताहारविहार होना आवश्यक है। त्यागपूर्वक अदन प्राणसाधना के लिये पथ्य के समान है। इस साधना से सब मलों का विनाश होकर प्रभु का दर्शन होता है । [३] हे प्राणापानो ! (युवम्) = आप दोनों (ऋतुथा) = समय-समय पर (होत्राम्) = दानपूर्वक यज्ञशेषरूप भोजन को (जुह्वते) = शरीर की वैश्वानर अग्नि में आहुत करते हो । हे (नरा) = नेतृत्व करनेवाले प्राणापानो! आप (जनाय) = लोगों के लिये (इषम्) = अन्न को (वहथः) = प्राप्त कराते हो । प्राणापान से युक्त होकर ही वैश्वानर अग्नि अन्न का पाचन करती है एवं अन्न को प्राप्त कराके व उसका ठीक से पाचन करके, हे प्राणापानो! आप (शुभस्पती) = सब शुभ बातों के रक्षण करनेवाले हो । प्राणापान ही शरीर को शुभ बनाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणापान शरीर को निर्दोष बनाते हैं, प्रभु का दर्शन करते हैं, अन्न का ठीक से पाचन करते हैं और शरीर में सब शुभों का रक्षण करते हैं ।