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प्रा॒तर्ज॑रेथे जर॒णेव॒ काप॑या॒ वस्तो॑र्वस्तोर्यज॒ता ग॑च्छथो गृ॒हम् । कस्य॑ ध्व॒स्रा भ॑वथ॒: कस्य॑ वा नरा राजपु॒त्रेव॒ सव॒नाव॑ गच्छथः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prātar jarethe jaraṇeva kāpayā vastor-vastor yajatā gacchatho gṛham | kasya dhvasrā bhavathaḥ kasya vā narā rājaputreva savanāva gacchathaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रा॒तः । ज॒रे॒थे॒ इति॑ । ज॒र॒णाऽइ॑व । काप॑या । वस्तोः॑ऽवस्तोः । य॒ज॒ता । ग॒च्छ॒थः॒ । गृ॒हम् । कस्य॑ । ध्व॒स्रा । भ॒व॒थः॒ । कस्य॑ । वा॒ । न॒रा॒ । रा॒ज॒ऽपु॒त्राऽइ॑व । सव॑ना । अव॑ । ग॒च्छ॒थः॒ ॥ १०.४०.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:40» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:18» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नरा) हे गृहस्थों के नेता वृद्ध स्त्री-पुरुषों ! (प्रातः-जरेथे) गृहस्थाश्रम के प्रथमावसर पर स्तुति प्रशंसा को प्राप्त करते हो (जरणा-इव कापया) तुम जरा से काँपते हुए जैसे (यजता वस्तोः-वस्तोः-गृहं गच्छथः) यजनीय-सत्करणीय प्रतिदिन नवविवाहित के घर पर जाते हो (कस्य ध्वस्रा भवथः) किसी के दोष के ध्वंसक-नाशक होते हो (राजपुत्रा-इव कस्य सवना-अव गच्छथः) राजकुमारों की भाँति किसी के भी नवगृहस्थ के उत्सवों में पहुँचते हो ॥३॥
भावार्थभाषाः - स्थविर गृहस्थ स्त्री-पुरुष के योग्य होते हैं। वे प्रतिदिन सम्मानित हुए, गृहस्थ के घर में राजकुमारों की भाँति सम्मान पाये हुए, उनके दोषों को दूर करने के लिए भिन्न-भिन्न उत्सवों में सम्मिलित हों ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दोषों को जीर्ण करनेवाले

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! आप (जरणा इव) = दोषों को जीर्ण करनेवालों के रूप में प्रातः - प्रातः काल के समय (कापया) = [कं आ पाति] सुख का समन्तात् रक्षण करनेवाली वेद-वाणी के द्वारा जरेथे = स्तुति किये जाते हो । [२] (वस्तोः वस्तोः) = प्रतिदिन (यजता) = यष्टव्य-उपासना के योग्य, अश्विनी देवो! आप (गृहं गच्छथः) = इस शरीर रूप घर को प्राप्त होते हो और (कस्य) = किसी एक दोषरूप अंश के (ध्वस्त्रा) = नाश करनेवाले (भवथः) = होते हो और (राजपुत्रा इव) = [राज्= दीप्तौ, पु= पुनाति, त्र= त्रायते] दीप्त करनेवाले, पवित्र करनेवाले तथा त्राण व रक्षण करनेवालों के समान (नरा) = आगे ले चलनेवाले आप (कस्य) = किसी एक के (सवना) = बाल्यकाल रूप प्रातः सवन, यौवनरूप माध्यन्दिन सवन तथा वार्धक्य रूप तृतीय सवन में (अवगच्छथः) = प्राप्त होते हो। इन तीनों सवनों में ये प्राणापान हमारे जीवन को दोषों के नाश के द्वारा दीप्त पवित्र व रक्षित करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रातः काल के नैत्यिक कर्त्तव्यों में प्राणसाधना का प्रमुख स्थान होना चाहिए। ये शरीर के दोषों का नाश करनेवाले हैं, और शरीर को दीप्त बनानेवाले हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नरा) हे गृहस्थानां नेतारौ स्थविरपुरुषौ ! युवाम् (प्रातः जरेथे) गृहस्थाश्रमस्य प्रथमावसरे स्तुतिं प्रशंसां प्राप्नुथः (जरणा-इव कापया) युवां जरया-इव कम्पमानौ “बाहुलकात् नलोपपूर्वकात् कपि धातोः स्वार्थिकणिजन्तात् कर्त्तरि ‘अण्’ प्रत्यय औणादिकः” (यजता वस्तोः वस्तोः गृहं गच्छथः) यजनीयौ प्रतिदिनं नवविवाहितस्य गृहं गच्छथः (कस्य ध्वस्रा भवथः) कस्यापि दोषस्य ध्वंसकौ नाशकौ भवथः (राजपुत्रा-इव कस्य सवना-अवगच्छथः) राजकुमाराविव कस्यापि नवगृहस्थस्य सन्तानप्रसवोत्सवान् प्राप्नुथः ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Early morning, like venerable divinities you are honoured with songs of praise. Venerable and adorable, you visit the devotee’s home day by day. Whose weaknesses do you destroy? And O leading lights of humanity, whose house and yajna do you visit like the princes of a royal realm?