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कुह॑ स्विद्दो॒षा कुह॒ वस्तो॑र॒श्विना॒ कुहा॑भिपि॒त्वं क॑रत॒: कुहो॑षतुः । को वां॑ शयु॒त्रा वि॒धवे॑व दे॒वरं॒ मर्यं॒ न योषा॑ कृणुते स॒धस्थ॒ आ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kuha svid doṣā kuha vastor aśvinā kuhābhipitvaṁ karataḥ kuhoṣatuḥ | ko vāṁ śayutrā vidhaveva devaram maryaṁ na yoṣā kṛṇute sadhastha ā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कुह॑ । स्वि॒त् । दो॒षा । कुह॑ । वस्तोः॑ । अ॒श्विना॑ । कुह॑ । अ॒भि॒ऽपि॒त्वम् । क॒र॒तः॒ । कुह॑ । ऊ॒ष॒तुः॒ । कः । वा॒म् । श॒यु॒ऽत्रा । वि॒धवा॑ऽइव । दे॒वर॑म् । मर्य॑म् । न । योषा॑ । कृ॒णु॒ते॒ । स॒धऽस्थे॑ । आ ॥ १०.४०.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:40» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे विवाहित स्त्री-पुरुषों ! तुम दोनों (कुह दोषा) किस स्थान में रात्रि को (कुह वस्तोः) और कहाँ दिन में (कुह-अभिपित्वं करतः) कहाँ भोजनादि की अभिप्राप्ति करते हो (कुह-ऊषतुः) कहाँ वास करते हो (वां शयुत्रा कः) तुम दोनों का शयनाश्रम कौन सा है (विधवा-इव देवरम्) जैसे विधवा और देवर का नियोग हो जाने पर व्यवहार होता है (मर्यं न योषा सधस्थं कृणुते) जैसे वर के प्रति वधू सहस्थान बनाती है, ऐसे विवाहित स्त्री-पुरुषों ! तुम्हारा व्यवहार हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ स्त्री-पुरुषों को सदा प्रेम के साथ रहना चाहिए। जैसे विवाहकाल में वर-वधू स्नेह करते थे, वह स्नेह बना रहे। कदाचित् मृत्यु आदि कारणवश दोनों का वियोग हो जाये, तो सन्तान की इच्छा होने पर नियोग से सन्तानलाभ कर सकते हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जीवन यात्रा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (दोषा) = रात्रि में (कुह स्वित्) = कहाँ (अभिपित्वं करतः) = अभिप्राप्ति को करते हो। (कुह) = कहाँ (वस्तोः) = दिन में होते हो, (कुह) = कहाँ (ऊषतु) = आपका निवास होता है। जब कि सब इन्द्रियाँ सो जाती हैं उस समय भी ये प्राणापान जागते रहकर अपने कार्य में प्रवृत्त रहते हैं । वस्तुतः उस रात्रि के समय सारे शोधन के कार्य को ये करनेवाले होते हैं । [२] (कः) = कोई व्यक्ति ही (वाम्) = आप दोनों को (सधस्थे) = आत्मा और परमात्मा के सम्मिलित रूप से स्थित होने के स्थान हृदय में (आकृणुते) = अभिमुख करता है। प्राणसाधना का ध्यान विरल पुरुषों को ही होता है । इस साधना में प्राणों को हृदय में पूरित करके उन्हें इस प्रकार वेग से छोड़ा जाता है जैसे कि उनका प्रच्छर्दन [वमन] ही हो रहा है। इस 'प्रच्छर्दन व विधारण' रूप प्राणसाधन से रुधिर का शोधन होकर शरीर में सब उत्तमताओं का प्रापण होता है। [३] प्राणों को इस प्रकार अभिमुख करने का प्रयत्न करना चाहिये (इव) = जैसे कि (विधवा) = पति के चले जाने पर अपत्नीक स्त्री (देवरम्) = देवर को अभिमुख करती है और (न) = जैसे (योषा) = पत्नी (शयुत्रा) = शयन-स्थान में (मर्यम्) = पति को अभिमुख करती है। जैसे घर का कार्य केवल पत्नी नहीं चला सकती, वह पति को अभिमुख करके ही कार्य कर पाती है, इसी प्रकार जीव प्राणों को अभिमुख करके ही घर के कार्य को चला पाता है। एक विधवा के लिये देवर की सहायता आवश्यक है, इसी प्रकार जीव के लिए प्राण का सहाय आवश्यक है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जीव प्राणों के सहाय से ही जीवनयात्रा को पूर्ण कर पाता है।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे विवाहितौ स्त्रीपुरुषौ ! युवाम् (कुह दोषा) कस्मिन् स्थाने रात्रौ (कुह वस्तोः) कस्मिन् स्थाने दिने (कुह-अभिपित्वं करतः) कुत्राभिप्राप्तिं भोजनादिकस्य कुरुथः “पुरुषव्यत्ययश्छान्दसः” (कुह-ऊषतुः) कुह वासं कुरुथः (वां शयुत्रा कः) युवयोः शयनाश्रमः कः (विधवा-इव देवरम्) यथा देवरं द्वितीयवरं नियोगेन प्राप्तं विधवा कृणुते (मर्यं न योषा सधस्थे कृणुते) यथा वरं प्रति वधूः सहस्थानं करोति तथा गृहस्थस्त्रीपुरुषौ युवां वर्तयथ सहस्थानं च कुरुथः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, man and woman, where were you at night? Where in the day? Where do you find food and rest? Where do you live? Where do you sleep? Where do you stay together like the widow with her second husband, or a maiden married to a youth? Who invites you to yajna?