निषादः गृहिणी गृहमुच्यते - पति की योग्यताएँ
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र की अन्तिम पंक्ति से गृहस्थाश्रम का संकेत हुआ है । उसी का चित्रण करते हुए कहते हैं कि (यद्) = जब (युवा) = एक नौजवान 'अवगुणों को अपने से पृथक् करके गुणों को अपने साथ जोड़नेवाला पुरुष' (ह) = निश्चय से (युवत्याः) = एक युवति के (योनिसु) = गृहों में क्षेति निवास करता है, तो (तस्य न विद्म) = उस गृहस्थाश्रम के कर्त्तव्य को हम पूरा-पूरा नहीं जानते, (तद्) = उस कर्त्तव्य को (उ) = निश्चय से (सु प्रवोचत) = उत्तमता से हमारे लिये बतलाओ । यहाँ वर्णनशैली से यह स्पष्ट है कि 'गृहिणी गृहमुच्यते ' = पत्नी ही घर है। घर पत्नी ने बनाना है, उस घर में पति उत्तम निवासवाला होता है । [२] घर पत्नी का होता है, परन्तु प्रारम्भ में कन्या ही तो पितृगृह को छोड़कर पतिगृह में पहुँचती है। उस समय वह अश्विनी देवों से आराधना करती है कि (अश्विना) = हे प्राणापानो! (तद् उश्मसि) = हम यह चाहते हैं कि हम गृहं गमेम उस पति के घर को प्राप्त हों जो कि (प्रियोस्त्रियस्य) = [प्रियाः उस्त्रियाः यस्मैः उस्त्रिया = गौ, रश्मि] गौवों का प्रिय हो, घर में गौ रखने का चाव रखता हो । अथवा जिसे ज्ञान की रश्मियाँ प्रिय हैं, जो अनपढ़ व गंवार नहीं है, ज्ञान की रुचिवाला है। (वृषभस्य) = शक्तिशाली व गृहस्थ की गाड़ी को खेंचने में समर्थ है। (रेतिनः) = रेतस्वाला है, नपुंसक नहीं। वस्तुतः ऐसा व्यक्ति ही गृहस्थ में जाने का अधिकारी है। इससे भिन्न को गृहस्थ में जाने का अधिकार न होना चाहिए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - घर का निर्माण पत्नी ने करना है। पति वही ठीक है जो कि अनपढ़ व कमजोर नहीं । अनपढ़ व कमजोर पति गृहस्थ को स्वर्ग नहीं बना सकता ।