मनीषा व गीः प्रभु की वाणी
पदार्थान्वयभाषाः - हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो ! (ते ब्रह्म च) = आप का 'ज्ञान' (ते नमः) = आपके प्रति नमन (च) = तथा (इयं) = यह आपकी (गीः) = वेदवाणी (सदम् इत्) = सदा ही (वर्धनी भूत्) = हमारे वर्धन का कारण बने । आपकी कृपा से हम ज्ञान को प्राप्त करें, नतमस्तक हों तथा यह आपकी वेदवाणी हमें उन्नतिपथ पर ले चलनेवाली हो । हे (अग्ने) = हे अग्रगति के साधक परमात्मन् (अप्रयुच्छन्) = प्रमादरहित होकर पूर्ण सावधानी से (नः) = हमारे (तनयानि तोका) = पुत्र-पौत्रों को भी (रक्ष) = सब प्रकार के व्यसनों के बन्धनों में पड़ने से बचाइये, (उत) = और (नः) = हमारे (तन्वः) = शरीरों को भी (रक्षा) = सुरक्षित करिये । हमारे मन व बुद्धि, गतमन्त्र के निर्देश के अनुसार, हमारे लिए तस्कर न बन जायें, वे इन्द्रिय रूप रस्सियों से हमें जकड़ कर नष्ट ही न कर डालें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हे प्रभो! आप हमें ज्ञान, नम्रता व वेदवाणी ( स्वाध्याय) प्राप्त कराइये। ये इस जीवनयात्रा में हमारी उन्नति का कारण बनें। हमारा वंश भी पवित्र भावनाओं वाला होकर फले व फूले। इस सूक्त का प्रारम्भ में प्रभु को संसार रूप मरुस्थली में एक प्याऊ के समान चित्रित करने से हुआ है, [१] वे प्रभु ही शीतार्त मनुष्य के लिये एक कोष्णगृह [कुछ-कुछ गर्म गृह] के समान हैं, [२] माता के समान यह हम शिशुओं का वर्धन करते हैं, [३] पर हम मूढ़ उस माता की महिमा को समझते नहीं, [४] कोई एक आध विरल व्यक्ति ही उस प्रभु की पवित्र धाराओं में स्नान करनेवाला बनता है, [५] सामान्यतः तो मनुष्य बुद्धि व मनरूप चोरों से इन्द्रियरूप रज्जुओं द्वारा बाँधे जाते हैं, [६] प्रभु कृपा होती है तो हमें ज्ञान-नम्रता व प्रभु की यह वेदवाणी प्राप्त होती है और हमें बन्धनमुक्त कर आगे बढ़ानेवाली बनती है, [७] यह ज्ञान व नम्रता हमें सब सम्पत्तियों के आधार उस आनन्दमय प्रभु की ओर ले चलते हैं-