दो-चार - दस रस्सियों से बाँधते हैं
पदार्थान्वयभाषाः - 'मनुष्य ज्ञानी क्यों नहीं बन पाता' ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि (इव) = जैसे वन- इस शरीर में ही निवास करनेवाले (तनूत्यजा) = शरीर की सब शक्तियों को क्षीण कर डालनेवाले (तस्करा) = उस-उस अवाञ्छनीय कार्य को करनेवाले [तत् तत् करोति इति तस्कर:] मन व बुद्धि (दशभि रशनाभिः) = दस इन्द्रिय रूप रस्सियों से (अभ्यधीताम्) = खूब अच्छी तरह धारण कर लेते हैं, जकड़ लेते हैं। मनुष्य को इन इन्द्रियों के व्यसनों में फँसाकर नष्ट कर डालते हैं । जब प्रभु कृपा होती है तो हम तभी इस बन्धन से बच पाते हैं । मन्त्र में कहते हैं कि हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! मुझे बन्धनों से छुड़ाकर आगे ले चलनेवाले प्रभो ! (इयम्) = इस वेदवाणी में (नव्यसी) = अत्यन्त स्तुत्य (मनीषा) = बुद्धि व ज्ञान प्राप्त होता है। इसके द्वारा मेरी बुद्धि सद्बुद्धि बनती है । इस मन को काबू करनेवाली मनीषा के द्वारा हे प्रभो ! आप (न) = जिस प्रकार रथ को उत्तम घोड़ों से जोतते हैं उसी प्रकार (रथम्) = मेरे इस शरीररूप रथ को (शुचयद्धि अंगैः) = अत्यन्त पवित्र कार्यों में व्याप्त गतिशील इन्द्रियाश्वों से (युवा) = युक्त करिये । अर्थात् मेरी इन्द्रियाँ व्यसनों फँसकर मेरे लिये बन्धन होकर उन्नति में विघ्नभूत न हो जाएँ। पवित्र बुद्धि के द्वारा मेरा मन भी पवित्र हो, और मेरी ये इन्द्रियाँ शरीर रूप रथ को त्वरित गति से लक्ष्यस्थान की ओर ले जानेवाले घोड़ों के समान हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे मन व बुद्धि पवित्र हों, हमारी इन्द्रियाँ हमारे लिए बन्धनरज्जु न हो जाएँ ।