पदार्थान्वयभाषाः - (शिशुं न त्वा) = एक बच्चे के समान तुझे (जेन्यं वर्धयन्ती) = [जयशीलं जि, विकासशीलं वा जन्] जयशील व विकासशील के रूप में बढ़ाती हुई (माता) = यह तेरे जीवन का निर्माण करनेवाली प्रभु रूप माता (सचनस्यमाना) = सदा तेरे सम्पर्क को चाहती हुई (बिभर्ति) = तेरा पोषण करती है। माता जैसे बच्चे का वर्धन करती है, उसी प्रकार प्रभु हमारा वर्धन करते हैं। ये हमें जयशील व विकासशील बनाते हैं। जीवन का निर्माण प्रभु ने ही करना है। ये प्रभु हमारा सम्पर्क कभी छोड़ते नहीं। सांसारिक माता कभी साथ छोड़ भी दे, परन्तु प्रभु हमारा साथ देंगे ही। प्रभु के सम्पर्क में रहनेवाला व्यक्ति 'जेन्य' =जयशील व विकासशील बनता है। जीव से कहते हैं कि (धनो:) = [प्रणवो धनुः] ओंकाररूप धनुष् के द्वारा (प्रवता) = निम्न मार्ग से, अर्थात् सदा झुककर नम्रता से चलता हुआ तू (अधियासि) = उस प्रभु तक पहुँचता है । नम्रता ही तेरे उत्थान के कारण हो जाती है। इस उत्थान में 'ओम्' का जप तेरे लिये सहायक होता है। इस जप से तेरी चित्तवृत्ति ठीक बनी रहती है । (हर्यन्) = [गतिकान्त्योः] उस प्रभु की ओर चलता हुआ और उस प्रभु को चाहता हुआ तू (जिगीषसे) = उस प्रभु को उसी प्रकार प्राप्त करना चाहता है, (इव) = जैसे (अवसृष्टः पशुः) = खुला छोड़ा हुआ पशु अपने गोष्ठ के प्रति आता है। जीव भी बन्धनों से मुक्त हुआ हुआ प्रभु की ओर जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु सदा साथ देनेवाली माता है, वह हमें जयशील व विकासशील बनाती है ओम् के जप से नम्रता से चलते हुए हम प्रभु को उसी प्रकार प्राप्त करते हैं जैसे कि बन्धनमुक्त हुआ हुआ पशु गोष्ठ को प्राप्त होता है।