विमद का पुरुमित्र की योषणा से परिणय
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे अश्विनी देवो ! (युवम्) = आप दोनों (वि-मदाय) = मद व गर्वरहित पुरुष के लिये (रथेन) = इस शरीररूप रथ के द्वारा (पुरुमित्रस्य) = [सर्वमित्रस्य] प्राणिमात्र के मित्र उस प्रभु की शुन्ध्युवम्-शुद्ध करनेवाली, जीवन को शुद्ध बनानेवाली (योषणाम्) = [यु- मिश्रणामिश्रणयोः] अवगुणों से पृथक् करनेवाली व गुणों से युक्त करनेवाली वेदवाणि को (न्यूहथुः) = निश्चय से प्राप्त कराते हो । प्राणसाधना के होने पर बुद्धि तीव्र होती है और मनुष्य अपने इस मानव जीवन में ज्ञान की वाणियों का संग्रह करता है। ये वाणियाँ उसे उत्तम प्रेरणा देती हुई उसके जीवन को शुद्ध बनाती हैं। यह प्रभु की योषणा [शं० ३ । २ । १ । २२ योषा वा इवं वाक् ] विमद को प्राप्त होती है, यही विमद का पुरुमित्र की योषणा से विवाह है। अभिमानी ज्ञान को नहीं प्राप्त कर पाता । [२] हे प्राणापानो! (युवम्) = आप (वधिमत्याः) = अपनी इन्द्रियों को संयमयज्ञ द्वारा बन्धन में बाँधनेवाली के (हवं अगच्छतम्) = पुकार को सुनकर उसको प्राप्त होते हो । अर्थात् प्राणापान उसी को लाभ पहुँचा पाते हैं जो कि संयमी होकर युक्ताहार-विहारवाला बने। वस्तुतः प्राणसाधना स्वयं संयम की साधना में सहायक होती है। [३] (युवम्) = आप दोनों (पुरन्धये) = पालक व पूरक बुद्धिवाली के लिये (सुषुतिम्) = उत्तम ऐश्वर्य को (चक्रथुः) = करते हो । अर्थात् प्राणसाधना से मनुष्य उत्तम बुद्धि को सम्पादन करनेवाला होता है और बुद्धिपूर्वक व्यवहार से उत्तम ऐश्वर्य को सिद्ध करनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से हम निरभिमान व ज्ञानवान् बनते हैं। हमारा जीवन संयमवाला होता है और बुद्धियुक्त होकर हम ऐश्वर्य का सम्पादन करनेवाले होते हैं ।