पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विनौ) = प्राणापानो ! (वाम्) = आप दोनों के (एतं स्तोमम्) = इस स्तवन को (अकर्म) = हम करते हैं कि (भृगवः न) = भृगुओं की तरह, [भ्रज् पाके] ज्ञान से अपने को परिपक्व करनेवालों के समान हम (रथं अतक्षाम) = इस शरीर रूप रथ का निर्माण करते हैं। भृगुओं का रथ निर्दोष होना ही चाहिये, ज्ञान से वहाँ सब दोष दग्ध हो जाते हैं । [२] (योषणां न) = पत्नी की तरह इस वेदवाणी रूप पत्नी को न्यमृक्षाम पूर्ण शुद्ध करते हैं । वेदवाणी को योषणा इसलिए कहा है कि वह 'यु मिश्रण अमिश्रण' हमारे साथ गुणों का मिश्रण करती है, अवगुणों का अमिश्रण । इसका ज्ञान प्राप्त करना ही इसका शोधन है। [३] (मर्ये) = अपने इस मरणधर्मा शरीर में उस (तनयम्) = हमारी शक्तियों का विस्तार करनेवाले (नित्यं सूनुं न) = [ षू प्रेरणे] उस सनातन प्रेरक के समान स्थित प्रभु को (दधानाः) = हम धारण करनेवाले होते हों । प्राणसाधना से हृदय निर्मल होता है अन्तः स्थित प्रभु का प्रकाश प्राप्त होता है, उससे दी जानेवाली प्रेरणा को हम सुनते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अश्विनी देवों का सच्ची स्तवन तो यही है कि हम शरीर रूप रथ को सुन्दर बनायें । बुद्धि को तीव्र बनाकर ज्ञान प्राप्त करें। हृदय को निर्मल बनाकर प्रभु की प्रेरणा को सुनें । सूक्त का प्रारम्भ इस रूप में हुआ है कि हमारा शरीर रूप रथ 'परिज्या व सुवृत्' हो, [१] हमारा जीवन 'सुनृत वाणी, बुद्धि, धन, वीर्य व क्रियाशीलता' से युक्त हो, [२] प्राणापान की शक्ति की वृद्धि से ही पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त होता है, [३] प्राणापान मनुष्य को पुनर्युवा बना देते हैं, [४] प्राणापान का उपासक 'नीरोगता, निर्मलता व बुद्धि की तीव्रता रूप सत्य को धारण करता है, [५] प्राणों के साथ ही सब कुछ है, [६] इनकी साधना से हम निरभिमान व ज्ञानवान् बनते हैं, [७] इनकी साधना से वार्धक्य नहीं आता, पुरुष वासनों में नहीं फँसता तथा अनथक क्रियाशील बना रहता है, [८] इनकी साधना से यह तप्त अग्निकुण्ड सम संसार 'शान्त सरोवर' बन जाता है, [९] इनकी साधना से इन्द्रियों के दोषों का दहन हो जाता है, [१०] पाप - दुरित व भय भाग जाते हैं, [११] इनकी साधना से दिन-रात सुन्दर बन जाते हैं, [१२] हम मार्ग पर चलते हुए विजयी होते हैं, [१३] प्राणों का सच्चा स्तवन यही है कि हम शरीर रूप रथ को सुन्दर बनाएँ, [१४] इस प्रभु रूप रथ को हम भूषित करें-