वृक के मुख से वर्तिका - मोचन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (ता) = वे आप दोनों गतमन्त्र में वर्णित ऋभुओं से निर्मित (जयुषा) = सदा विजय करनेवाले रथ से (वर्तिः यातम्) = मार्ग पर चलो। प्राणसाधना से मनुष्य विषयों की ओर जाता ही नहीं, एवं वह मार्गभ्रष्ट नहीं होता। प्राणसाधक सदा सन्मार्ग से ही गति करता है । [२] हे प्राणापाणो! आप (पर्वतम्) = शरीर रथ में आधाय दण्ड के रूप में स्थित मेरुदण्ड व मेरुपर्वत [= रीढ़ की हड्डी] को (अपिन्वतम्) = [to animrte] प्रीणित करो। इसके स्वास्थ्य पर शरीर के स्वास्थ्य का निर्भर है, प्राणायाम के द्वारा इसमें स्थित 'इडा पिंगला व सुषुम्णा' इन तीनों नाड़ियों का कार्य ठीक से होने लगता है। [३] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (शयवे) = [शी = trengnility] शान्त-स्वभाववाले के लिये (धेनुम्) = वेदवाणी रूप गौ को (अपिन्वतम्) = प्रीणित करते हैं । प्राणसाधना से बुद्धि की तीव्रता होने से यह 'शयु' इस वेदवाणी रूप गौ के ज्ञानदुग्ध का खूब ही पान कर पाता है । [४] (युवम्) = आप दोनों (शचीभिः) = शक्तियों से (वृकस्य आस्यात् अन्तः) = भेड़िये के मुख में से (ग्रसितां चित् वर्तिकाम्) = निगली भी गई वर्तिका को (अमुञ्चतम्) = छुड़ा देते हो। यहाँ 'वृक' लोभ है, लोभ ही भेड़िये के रूप में चित्रित हुआ है। 'वर्तिका' [performamce prrctice] यज्ञादि कर्मों का करना है। लोभ रूप भेड़िया यज्ञादि कर्मरूप बटेर को निगल जाता है। लोभ के होने पर ये सब उत्तम कर्म नष्ट हो जाते हैं। प्राणसाधना लोभ को नष्ट करने के द्वारा इस वर्तिका को मुक्त कर देते हैं, फिर से हमारे जीवन में यज्ञादि कर्मों का प्रणयन होने लगता है। यह इन अश्विनी देवों की ही शक्ति है जो ऐसा कर पाती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से हम [क] मार्ग पर चलते हुए विजयी होते हैं, [ख] मेरुदण्ड को ठीक कर पाते हैं, [ग] ज्ञानदुग्ध का खूब पान करनेवाले होते हैं, [घ] लोभ को जीतकर यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त होते हैं ।