पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (तेन) = उस (मनसो जवीयसा) = मन से भी अधिक वेगवान रथ से (आयातम्) = प्राप्त होइये, (यम्) = जिस (वाम्) = आप दोनों के (रथम्) = शरीररूप रथ को (ऋभवः) = ऋभुओं ने (चक्रुः) = बनाया है । 'ऋभव:' तीन हैं 'ऋभु विभ्वन् और वाज'। इनमें (ऋभु) = ऋतेन भाति, उस भाति (वा) = सत्य-ज्ञान से दीप्त है। (विभ्वन्) = व्यापक व विशाल हृदय है । वाज शक्तिशाली है । एवं ऋभुओं से बनाये गये रथ का भाव यह हो जाता है कि वह शरीर जिसमें मस्तिष्क सत्य ज्ञान से पूर्ण है, मन विशाल है और अंग-प्रत्यंग शक्तिशाली हैं । [२] यह वह रथ है, (यस्य) = जिसके योगे-मेल के होने पर (दिवः दुहिता) = ज्ञान का पूरण करनेवाली वेदवाणी (जायते) = आविर्भूत होती है और (विवस्वतः) = सूर्य के अर्थात् सूर्य के कारण उत्पन्न हुए-हुए (उभे अहनी) = दोनों रात व दिन (सुदिने) = उत्तम होते हैं। शरीर रूप रथ के ठीक होने पर ज्ञान का प्रकाश तो होता ही है, रात और दिन दोनों बड़ी सुन्दरता से बीतते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें सत्यज्ञान के प्रकाशवाला, विशाल हृदयवाला, सशक्त अंगोंवाला शरीर-रूप रथ प्राप्त हो। इस रथ के मिलने पर ज्ञान का हमारे में पूरण हो और हमारे दिन-रात सुन्दर बीतें ।