पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (विचक्षण) = सबका विशेषरूप से ध्यान करनेवाले (सूर्य) = सवितः ! (वयं जीवाः) = हम जीवनधारी प्राणी (बृहतः पाजसः परि) = वृद्धि की कारणभूत शक्ति का लक्ष्य करके (आरोहन्तम्) = आकाश में आरोहण करते हुए (त्वा) = तुझे (प्रतिपश्येम) = प्रतिदिन देखनेवाले हों । उदय होता हुआ सूर्य रोग- कृमियों को नष्ट करता है और इस प्रकार हमें नीरोग बनाकर यह हमारी शक्ति का वर्धन करता है । यह 'हिरण्पाणि' है, इसकी किरणरूप हाथों में स्वर्ण होता है, यह उस स्वर्ण को हमारे शरीरों में निक्षिप्त करके हमें शक्ति सम्पन्न करता है । [२] हे सूर्य ! उस तुझको हम देखें जो (माहि ज्योतिः बिभ्रतम्) = महनीय ज्योति को धारण कर रहा है। (भास्वन्तम्) = दीप्तिवाला है । (चक्षुषेचक्षुषे मयः) = आँख मात्र के लिये हितकर है, दृष्टि शक्ति को बढ़ानेवाला है। इस सूर्य की किरणों को अपने शरीरों पर लेते हुए हम भी अपनी बुद्धि में महनीय ज्योति को धारण करते हैं, हमारे हृदय प्रकाशमय हो उठते हैं और हमारी आँखें नीरोग होकर तीव्र दृष्टि शक्तिवाली बनती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सूर्य 'बुद्धि, मन व शरीर' सभी को स्वस्थ करनेवाला है। बुद्धि को ज्योति देता है, हृदय को प्रकाश तथा आँखों को नीरोगता ।