वांछित मन्त्र चुनें

वि॒श्वाहा॑ त्वा सु॒मन॑सः सु॒चक्ष॑सः प्र॒जाव॑न्तो अनमी॒वा अना॑गसः । उ॒द्यन्तं॑ त्वा मित्रमहो दि॒वेदि॑वे॒ ज्योग्जी॒वाः प्रति॑ पश्येम सूर्य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvāhā tvā sumanasaḥ sucakṣasaḥ prajāvanto anamīvā anāgasaḥ | udyantaṁ tvā mitramaho dive-dive jyog jīvāḥ prati paśyema sūrya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि॒श्वाहा॑ । त्वा॒ । सु॒ऽमन॑सः । सु॒ऽचक्ष॑सः । प्र॒जाऽव॑न्तः । अ॒न॒मी॒वाः । अना॑गसः । उ॒त्ऽयन्त॑म् । त्वा॒ । मि॒त्र॒ऽम॒हः॒ । दि॒वेऽदि॑वे । ज्योक् । जी॒वाः । प्रति॑ । प॒श्ये॒म॒ । सू॒र्य॒ ॥ १०.३७.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:37» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:7


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्य) हे सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! (त्वा) तुझे (विश्वाहा) सर्वदा (सुमनसः) पवित्र अन्तःकरणवाले या प्रसन्न मनवाले (सुचक्षसः) पवित्र दृष्टिवाले-शोभन दृष्टिवाले या प्रशस्त नेत्रशक्तिवाले (प्रजावन्तः) प्रशस्त सन्तानवाले (अनमीवाः) रोगरहित (अनागसः) निष्पाप (जीवः) हम जीव (मित्रमहः) मित्रों स्नेही उपासकों द्वारा प्रशंसनीय, स्तुतियोग्य परमात्मन् ! या प्राणों को बढ़ानेवाले ! (त्वा) तुझको (दिवे-दिवे) प्रतिदिन (प्रतिपश्येम) प्रत्यक्ष साक्षात् करें ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का सक्षात्कार पवित्र मनवाले तथा प्रतिदिन उसकी स्तुति करनेवाले किया करते हैं और वे लोग निरोग एवं उत्तम सन्ततिवाले बन जाते हैं ॥७॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नीरोग निष्पाप दीर्घ जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मित्रमहः) = [प्रमीते, त्रायते, महस्= light, lustre ] रोगों से बचानेवाली ज्योतिवाले (सूर्य) = सवितः ! हम (विश्वाहा) = सदा (दिवेदिवे) = प्रतिदिन (उद्यन्तं त्वा) = उदय होते हुए तुझको (प्रतिपश्येम) = प्रतिक्षण देखनेवाले बनें। [२] हम (त्वा) = तुझे देखनेवाले इसलिए हों कि तेरे दर्शन से, तेरी किरणों के सम्पर्क में आने से हम [क] (सुमनसः) = उत्तम मनोंवाले हों। वस्तुतः तेरी किरणों से उत्पन्न नीरोगता हमारे मनों को भी अच्छा बनानेवाली हो। [ख] (सुचक्षसः) = हम उत्तम दृष्टि- शक्तिवाले हों । सूर्य ही तो वस्तुतः चक्षु बनकर आँखों में रह रहा है। सो सूर्य सम्पर्क से दृष्टि- शक्ति बढ़ेगी ही। [ग] (प्रजावन्तः) = हम उत्तम प्रजाओंवाले हों। हमारे स्वस्थ होने पर हमारी सन्तानें स्वस्थ होंगी ही । [घ] (अनमीवा:) = हम सब प्रकार से नीरोग हों। सूर्य किरणें रोग कृमियों का ध्वंस करके हमें अनमीव बनाती हैं। [ङ] (अनागसः) = हमारे मन भी निष्पाप हों। शरीर नीरोग तथा मन निष्पाप । [च] इस प्रकार नीरोग व निष्पाप बनकर हम (ज्योग् जीवाः) = दीर्घकाल तक जीनेवाले हों । वस्तुतः सूर्य मित्र है, हमें सब रोगों व पाप-वृत्तियों से बचानेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम सदा सूर्य-सम्पर्क में रहते हुए शरीर में नीरोग बनें, मनों में हम निष्पाप हों और इस प्रकार हम दीर्घजीवन को सिद्ध कर सकें।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्य) सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! (त्वा) त्वाम् (विश्वाहा) सर्वदा (सुमनसः) पवित्रान्तःकरणाः प्रसन्नमनसो वा (सुचक्षसः) पवित्रदृष्टिमन्तः शोभनदृष्टिमन्तः प्रशस्तनेत्रशक्तिका वा (प्रजावन्तः) प्रशस्तसन्ततिमन्तः (अनमीवाः) अरोगाः (अनागसः) निष्पापाः सन्तः (जीवाः) वयं जीवाः (मित्रमहः) स्नेहिभिः-स्नेहकर्तृभिरुपासकैः प्रशंसनीय स्तोतव्य परमात्मन् ! यद्वा प्राणानां वर्धयितः ! “प्राणो वै मित्रः” [श० ६।५।१।५] (त्वां) त्वाम् (दिवेदिवे) प्रतिदिनम् (प्रतिपश्येम) साक्षात्कुर्याम, प्रत्यक्षं पश्येम वा ॥७॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We pray, O sun, may we be happy at heart, enlightened of vision, blest with noble progeny, free from ill health, sin and evil, and thus happy and healthy, live long to see you rising every day all the time. May we, O sun, see you rising day by day as the greatest friend of ours and live long for a happy time in the light and bliss divine.