पूर्ण परिपक्वावस्था की प्राप्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नः) = हमारे (तत्) = उस (हवं वचः) = स्तुति वचन को (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक सुनें, अर्थात् मेरा मस्तिष्करूप द्युलोक तथा शरीरूप पृथिवी, गत मन्त्र में सूर्य के लिए किये गये स्तुति - वचन को तथा व्रत सङ्कल्प को (शृण्वन्तु) = सुनें। हम इनकी अनुकूलता से सूर्य की तरह गतिशील बन रहें। [२] (नः) = हमारे (तत्) = उस सङ्कल्प को (आप:) = जल सुनें, शरीर में जल रेतः कण हैं। ये रेतःकण हमारे व्रत के सङ्कल्प को पूर्ण करने में सहायक हों। [३] (इन्द्रः मरुतः) = इन्द्र और (मरुत्) = प्राण हमारे उस वचन को सुनें । जितेन्द्रियता तथा प्राणसाधना मुझे सूर्य के व्रत का पालन करने में समर्थ करें। मैं सूर्य की तरह गतिशील व उज्ज्वल बनूँ । इन्द्र सेनापति हैं, मरुत् उसके सैनिक हैं । अध्यात्म में इन्द्र 'जीव' है, प्राण उसके सैनिक हैं, मरुत् यहाँ ये प्राण ही हैं। इन प्राणों की साधना जीव को इस योग्य बनाती है कि वह सतत क्रियाशील होकर सूर्य की तरह चमकनेवाला बने । [४] हम द्यावापृथिवी, आप, इन्द्र व मरुतों से यही प्रार्थना करते हैं कि हम (शूने) = [ प्रवृद्धाय दुःखाय] बड़ी हुई दुःखमय स्थिति के लिये (मा भूम) = मत हों। हमारे दुःख न बढ़ते जायें। अपितु (सूर्यस्य संदृशि) = सूर्य के सन्दर्शन में (भद्रं जीवन्तः) = कल्याणमय जीवन को बिताते हुए (जरणाम्) = पूर्ण परिपक्वावस्था को (अशीमहि) = प्राप्त करें। 'सूर्य के सन्दर्शन में' ये शब्द स्पष्ट कर रहे हैं कि जीवन यथासम्भव खुले में [open में] बिताना ही ठीक है। जितना सूर्य किरणों के सम्पर्क में होंगे, उतना ही अच्छा है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ– द्यावापृथिवी आदि की अनुकूलता से हमारे दुःख दूर हों। सूर्य संदर्शन में भद्र जीवन बिताते हुए हम पूर्ण परिपक्वावस्था को प्राप्त करें।