पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सूर्य ! (प्रेषितः) = प्रभु से इस आकाश में प्रेषित हुआ हुआ तू (विश्वस्य) = सबके (व्रतम्) = व्रत का (रक्षसि) = रक्षण करता है। तेरे प्रकाश में ही सब अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं । (अहेडयन्) = किसी से भी घृणा न करता हुआ तू (स्वधा अनु) = आत्मतत्त्व के धारण का लक्ष्य करके [अनुर्लक्षणे] (रक्षसि) = उद्गत होता है सूर्य शरीर को नीरोग बनाता है और इस प्रकार इस शरीर में आत्मतत्त्व का धारण करता है। [२] सूर्य हे सूर्य ! (यद्) = जो (अद्य) = आज (त्वा उपब्रवामहै) = आपकी प्रार्थना करते हैं, (देवाः) = सब देव (नः) = हमारे (तं ऋतुम्) = उस सङ्कल्प को अनुमंसीरत= अनुमोदित करें। 'हम सूर्य का आराधन करनेवाले बनें' हमारे इस विचार को सब देव पुष्ट करें। सूर्य का आराधन यही है कि - [क] हम सूर्य की तरह निरन्तर गतिशील हों, [ख] किसी से भी घृणा न करते हुए सबके साथ समानरूप से वर्तनेवाले हों, [ग] सूर्य जैसे शुद्ध जल का ही उपादान करता है, इसी प्रकार हम सब जगह से गुणों का ही ग्रहण करनेवाले बनें। [घ] सूर्य जल की ऊर्ध्वगति का कारण होता है। इसी प्रकार हम शरीर में वीर्यशक्ति की ऊर्ध्वगति का साधन करें। [ङ] सूर्य रोग- कृमियों व अन्धकार का विनाशक है। हम भी शरीर में नीरोग बनें और मस्तिष्क में ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानान्धकार को नष्ट करें। बस यही सूर्य की पञ्चविध उपासना है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे शरीरस्थ सब देव हमें सूर्य का आराधक बनाएँ। इस आराधना से हम भी सूर्य की तरह चमकेंगे ।
अन्य संदर्भ: सूचना - प्रत्येक इन्द्रिय में एक-एक देव का वास है। मुख में 'अग्नि' का, अक्षिओं में 'सूर्य' का, कानों में दिशाओं का, मन में चन्द्रमा का । इसी प्रकार उस-उस इन्द्रिय में स्थित सब देव हमें सूर्योपासना की प्रेरणा दें। हम सूर्य-शिष्य बनते हुए चमकें ।