पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सूर्य ! (यत्) = जब (पतरैः) = गमनशील (एतशेभिः) = सात रंगों से चित्रित किरणरूप अश्वों से (रथर्यसि) = तू अपने रथ को जोतने की कामना करता है तो (प्रदिवः ते) = प्रकृष्ट प्रकाशवाले तेरे उदय होने पर (अदेवः) = अप्रकाशित वस्तु (न निवासते) = नहीं रहती है। सूर्य निकला, तो अन्धेरे का क्या काम ? सूर्य के किरणरूप अश्व 'एतश' हैं, चित्रविचित्र हैं। रंग-विरंगे होने से इनका नाम एतश है, इन्द्रधनुष में ये सातों रंग चित्रित होते हैं । [२] एक-एक किरण विविध प्राणशक्तियों को लिये हुए होती है । यह (प्राचीनम्) = पूर्व दिशा में उदय होनेवाले सूर्य का (अन्यत् रजः) = [रजतेर्ज्योतीरत्र उच्यते नि० ४। १९] यह विलक्षण प्रकाश अनुवर्तते सबके अनुकूल होता है । सूर्य तो हिरण्यपाणि है, यह अपने किरणरूप हाथों में gold inyection को लिये हुए है। इन किरणों का अपने शरीर पर लेना सबके स्वास्थ्य के लिये हितकर है। [३] (उत) = और (सूर्य) = हे सूर्य ! तू (अन्येन ज्योतिषा) = विलक्षण ज्योति के साथ ही तू (यासि) = अस्त होता है, पश्चिम दिशा में लोकान्तर में जाता है । अस्त होते हुए सूर्य की किरणों में भी अद्भुत शक्ति होती है । 'उद्यन् आदित्यः क्रिमीन् हन्ति निम्लोचन् हन्तु रश्मिभिः 'यह उदय व अस्त होता हुआ सूर्य किरणों से रोग-क्रिमियों का नाश करता है। इसकी ज्योति में यह अद्भुत शक्ति होती है। इसी का उल्लेख 'अन्यत्' शब्द से हुआ है। पूर्वा सन्ध्या व पश्चिमा सन्ध्या को सूर्याभिमुख होकर करने से हम शरीर के रोग-क्रिमियों को भी नष्ट कर रहे होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सूर्य सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश कर देता है और अद्भुत प्रकार से रोग-क्रिमियों का नाश करके नीरोगता प्रदान करता है।