पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देवाः) = सब प्राकृतिक देवो ! (जिह्वया) = जिह्वा से (मनसः प्रयुती वा) = अथवा मन के उन इन्द्रियों से मिल जाने से, इन्द्रियों से मिलकर विषयों में भटकने से ['इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसिं'] (यद्) = जो (वः) = आपका (गुरु) = महान् (देवहेडनम्) = देवों का निरादर चक्रम कर बैठते हैं, (तद् एनः) = उस पाप को, हे (वसवः) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले देवो ! (तस्मिन्) उस पुरुष में (निधेतन) = धारण करो (यः) = जो (अरावा) = न दान देनेवाला है, भोगवृत्तिवाला होने से स्वयं सब कुछ खा जानेवाला है और (नः अभि) = हमारा लक्ष्य करके (दुच्छुनायते) = अशुभ का आचरण करता है, अर्थात् हमें हानि पहुँचाकर भी अपने भोग- साधनों को जुटाने के लिये यत्नशील होता है । [२] शरीर का निर्माण करनेवाले देवों के विषय में अपराध यही है कि हम जिह्वा के स्वादवश अधिक व अपथ्य को खा जाएँ तथा हमारा मन भी इन इन्द्रियों से मिलकर मजा लेने लग जाए। यह मार्ग निश्चितरूप से अस्वास्थ्य का मार्ग है । [३] यह अपराध तो उसी से हो जो [क] दान देने की वृत्तिवाला न होकर [अरावा] सब कुछ स्वयं उपभोग करनेवाला हो तथा [ख] जो अपने भोग के लिये अन्याय से भी अर्थ-संचय करता हुआ औरों का अशुभ करने की वृत्तिवाला हो । जो कोई भी इस अपराध को करेगा वह इन शरीरस्थ देवों का निरादर कर रहा होगा। यह निरादर उसकी आधि-व्याधियों को जन्म देनेवाला होगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम जिह्वा के व मन के संयम से सब देवों के अनुकूल वृत्तिवाले हों । दान देने की वृत्तिवाले होकर किसी का अमंगल न करें । ऋत के द्वारा प्रभु के पूजन से यह सूक्त प्रारम्भ हुआ है । [१] ऋत व सत्य ही ऐहिक व पारलौकिक उन्नति का कारण है, [२] सूर्य की ज्योति अद्भुत है, [३] सूर्य अपनी ज्योति से 'अन्नाभाव, यज्ञाभाव, रोग व अशुभ स्वप्नों' को दूर कर देता है, [४] हमारे शरीरस्थ सब देव हमें सूर्य का आराधक बनाएँ, [५] सूर्य- संदर्शन में भद्र जीवन बिताते हुए हम पूर्ण परिपक्वावस्था को प्राप्त करें, [६] हम नीरोग, निष्पाप व दीर्घजीवन प्राप्त करें, [७] सूर्य 'शरीर, मन व बुद्धि' सभी को स्वस्थ करे, [८] आनागास्व व वसुमत्तरता को हम प्राप्त करें, [९] यह सूर्य हमें अद्भुत बल देता है, [१०] शान्ति, निर्भयता व निष्पापता को प्राप्त कराता है, [११] स्वस्थ रहने के लिये हम जिह्वा व मन से देवों के विषय में कोई अपराध न करें। अपथ्य व अतिभोजन ही वह सर्वमहान् पाप है, [१२] हम देवों के विषय में अपराध नहीं करेंगे तो सुगठित शरीरवाले [मुष्कवान्] जितेन्द्रिय पुरुष बन पाएँगे [इन्द्रः] । यह 'मुष्कवान् इन्द्र' अगले सूक्त का ऋषि है ।