शान्ति-निर्भयता-निष्पापता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देवा:) = सब प्राकृतिक [भौतिक] शक्तियो ! (अस्माकम्) = हमारे (उभयाय जन्मने) = दोनों प्रकार के प्राणियों के लिये, (द्विपदे) = मनुष्यों के लिये [दो पाँववालों के लिये] तथा (चतुष्पदे) = गवादि पशुओं के लिये (शर्म) = कल्याण को (यच्छत) = दीजिये । देवों की अनुकूलता ही हमें स्वस्थ बनाती है । [२] इन देवों की अनुकूलता से हमारे सब व्यक्ति (अदत् पिबत्) = खाते हुए व पीते हुए, अर्थात् अपचन आदि रोगों से पीड़ित न हुए-हुए और अतएव (ऊर्जयमानम्) = [ ऊर्जस्वन्तं इव आचरन्] सबल पुरुष की तरह आचरण करते हुए (आशितम्) = तृप्त हों । इन्हें खान-पान आदि की कमी न हो। [३] (तद्) = सो हे देवो! आप (अस्मे) = हमारे लिये (शम्) = शान्ति को (योः) = भयों के यावन-दूरीकरण को तथा (अरपः) = निर्दोषता को (दधातन) = धारण करिये। आपकी कृपा से हम 'शान्त, निर्भय व निष्पाप' बनें। वस्तुतः बाह्य देवों की अन्दर के देवों से अनुकूलता न होने पर ही सब अशान्ति व भय उत्पन्न होता है । शरीर का स्वास्थ्य बिगड़कर मानस-स्वास्थ्य भी बिगड़ता है और पाप प्रवृत्ति बढ़ती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सब देवों की अनुकूलता से हम सुखी हों हमारी पाचन शक्ति ठीक हो, हमारे जीवन में शान्ति, निर्भयता व निष्पापता हो ।