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नी॒चा व॑र्तन्त उ॒परि॑ स्फुरन्त्यह॒स्तासो॒ हस्त॑वन्तं सहन्ते । दि॒व्या अङ्गा॑रा॒ इरि॑णे॒ न्यु॑प्ताः शी॒ताः सन्तो॒ हृद॑यं॒ निर्द॑हन्ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nīcā vartanta upari sphuranty ahastāso hastavantaṁ sahante | divyā aṅgārā iriṇe nyuptāḥ śītāḥ santo hṛdayaṁ nir dahanti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नी॒चाः । व॒र्त॒न्ते॒ । उ॒परि॑ । स्फु॒र॒न्ति॒ । अ॒ह॒स्तासः॑ । हस्त॑ऽवन्तम् । स॒ह॒न्ते॒ । दि॒व्याः । अङ्गा॑राः । इरि॑णे । निऽउ॑प्ताः । शी॒ताः । सन्तः॑ । हृद॑यम् । निः । द॒ह॒न्ति॒ ॥ १०.३४.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:34» मन्त्र:9 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:4» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नीचा वर्त्तन्ते-उपरि स्फुरन्ति) ये जुए के पाशे कभी नीचे गये हुए अर्थात् स्वाधीन होते हैं, कभी ऊपर अर्थात् जुआरी को हरानेवाले होते हैं (अहस्तासः-हस्तवन्तं सहन्ते) हाथों से रहित हुए या हाथ से छूटे हुए हाथवाले-हाथ से फैंकनेवाले जुआरी मनुष्य को अभिभूत करते हैं-उसे दबाते हैं (दिव्याः अङ्गाराः) अलौकिक अङ्गारे बने हुए (इरिणे न्युप्ताः शीताः सन्तः) तृण-काष्ठ आदि रहित प्रदेश में गिरे हुए ठण्डे होते भी (हृदयं निर्दहन्ति) जुआरी के अन्तःकरण को दग्ध करते हैं-जलाते हैं। यह जुए का दुष्फल है ॥९॥
भावार्थभाषाः - जुए के पाशे चाहे हराते हुए हों, चाहे जिताते हुए हों, वे ठण्डे अङ्गारे से बनकर जुआरी के हृदय को जलाते रहते हैं-अशान्त किये रहते हैं, इसलिये जुआ खेलना बुरा है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नीचे होते हुए ऊपर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] जुए के ये पासे (नीचा वर्तन्ते) = नीचे द्यूत-फलक पर इधर-उधर वर्तमान होते हैं, पर (उपरि स्फुरन्ति) = पराजित होनेवालों के हृदय में ये दीप्तरूप से शासन करते हैं। इनके हृदयों में खलबली मचाने के कारण बनते हैं । (अहस्तासः) = ये हाथवाले तो नहीं हैं, परन्तु (हस्तवन्तं सहन्ते) = हाथवाले का पराभव करते हैं। पासों के हाथ तो नहीं हैं, परन्तु इन हाथवाले जुवारियों के ये पराभूत करनेवाले होते हैं। [२] ये पासे तो (दिव्या अंगारा:) = जुए के खेलने के साधनभूत कुछ अलौकिक अंगारों के समान हैं । (इरिणे) = द्यूत फलक पर (न्युप्ताः) = ये फेंके जाते हैं। (शीताः सन्तः) = स्पर्श में ठण्डे होते हुए भी (हृदयम्) = पराजित पुरुष के हृदय को (निर्दहन्ति) = जलानेवाले होते हैं, उनके हृदयों के सन्ताप का कारण बनते हैं। [३] प्रस्तुत मन्त्र में 'नीचा: - उपरि, अहस्तासः हस्तवन्तं, शीता: - निर्दहन्ति' इन शब्द-युग्मों से विरोधाभास अलंकार का सुन्दर प्रतिपादन है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पासे दिव्य अंगारों के समान हैं, ये स्पर्श में ठण्डे होते हुए भी पराजित पुरुष के हृदय-दाह का कारण बनते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नीचा वर्त्तन्ते-उपरि स्फुरन्ति) एतेऽक्षा द्यूत-साधनपदार्थाः कदाचित् खलु नीचा नीचैर्गताः स्वाधीना वर्त्तन्ते कदाचित् खलूपरि प्रगच्छन्ति कितवस्य पराजयकरा भवन्ति (अहस्तासः हस्तवन्तं सहन्ते) हस्तरहिताः सन्तो हस्ताच्च्युता वा हस्तवन्तं हस्तेन क्षेप्तारं कितवं द्यूतकारिणं जनमभिभवन्ति। (दिव्याः-अङ्गाराः) अलौकिका अङ्गाराः (इरिणे न्युप्ताः शीताः सन्तः) ओषधिरहिते तृणकाष्ठादिरहिते प्रदेशे “इरिणं निर्ऋणम्-ऋणातेरपार्णं भवति अपरता अस्मादोषधय इति वा” [निरु०९।६] निक्षिप्ताः शीताः सन्तोऽपि (हृदयं निर्दहन्ति) कितवस्य द्यूतकारिणो हृदयमन्तःकरणं निर्दग्धं कुर्वन्ति, इति द्यूतस्य दुष्फलम् ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Some time they go down, some time they spring up high, and although they are armless they beat the strongest armed warrior. Thrown upon the dice board, they can be burning brilliant and some time, even though ice cold, they burn the heart.