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स॒भामे॑ति कित॒वः पृ॒च्छमा॑नो जे॒ष्यामीति॑ त॒न्वा॒३॒॑ शूशु॑जानः । अ॒क्षासो॑ अस्य॒ वि ति॑रन्ति॒ कामं॑ प्रति॒दीव्ने॒ दध॑त॒ आ कृ॒तानि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sabhām eti kitavaḥ pṛcchamāno jeṣyāmīti tanvā śūśujānaḥ | akṣāso asya vi tiranti kāmam pratidīvne dadhata ā kṛtāni ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒भाम् । ए॒ति॒ । कि॒त॒वः । पृ॒च्छमा॑नः । जे॒ष्यामि॑ । इति॑ । त॒न्वा॑ । शूशु॑जानः । अ॒क्षासः॑ । अ॒स्य॒ । वि । ति॒र॒न्ति॒ । काम॑म् । प्र॒ति॒ऽदीव्ने॑ । दध॑तः । आ । कृ॒तानि॑ ॥ १०.३४.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:34» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:4» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कितवः-तन्वा शूशुजानः पृच्छमानः सभाम्-एति) जुआ खेलनेवाला शरीर से आवेश में आता हुआ द्यूतक्रीडा में प्रसिद्ध हुआ पूछने-हेतु जुआरी की मण्डली में जाता है (जेष्यामि) प्रकट करता है कि मैं जीतूँगा (प्रतिदीव्ने-अक्षासः-अस्य कृतानि-आदधतः कामं वि तरन्ति) जुए में प्रतिपक्ष को लक्ष्य करके पाशे इसके कर्मों को भलीभाँति धारण करते हुए के यथेच्छ जय को प्रदान करते हैं ॥६॥ 
भावार्थभाषाः - जुआरी शरीर में आवेश खाया हुआ, बोलता हुआ जुआरियों की मण्डली में जय की इच्छा से जाता है। प्रतिपक्षी को लक्ष्य करके कि ये पाशे मुझे जय दिलाएँगे, ऐसी उसकी भावना है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हार से इच्छा में और वृद्धि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कितवः) = यह जुवारी (पृच्छमान:) = यह पूछता हुआ कि 'कौन-कौन आया है' (सभां एति) = द्यूत - सभा में आता है। वह उस समय जेष्यामि इति 'जीत जाऊँगा' इस भावना के कारण (तन्वा शूशुजान:) = शरीर से खूब [ दीप्यमानः ] चमक रहा होता है, खूब खुशी में फूला हुआ होता है । [२] वहाँ (प्रतिदीने) विरोधी जुवारी के लिये कृतानि पुरुषार्थ से सम्पादित धनों को (आदधतः) = धारण करते हुए (अस्य) = इस जुवारी के (कामम्) = जुए की अभिलाषा को (अक्षासः) = पासे (वितिरन्ति) = और अधिक बढ़ा देते हैं। जितना यह हारता है उतनी ही इसकी जुए की इच्छा और बढ़ती जाती है। यह बढ़-बढ़कर दाव लगाता है और सोचता है कि अब के तो अवश्य जीतूंगा । 'हार-जीत तो हुआ ही करती है, अब के हारा हूँ तो अगली बार जीतूंगा भी इस प्रकार सोचता हुआ यह जुए की खेल में और अधिक फँस जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हार इसकी खेलने की इच्छा को और अधिक बढ़ा देती है । ऋषिः - कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कितवः-तन्वा शूशुजानः पृच्छमानः सभाम्-एति) द्यूत-क्रीडी जनः शरीरेण दीप्यमानः कितवकर्मणि प्रसिद्धः पृच्छमानः प्रष्टुं यतमानः कितवः सभां गच्छति (जेष्यामि) अहं जयं करिष्यामि (प्रतिदीव्ने-अक्षासः-अस्य कृतानि-आदधतः कामं वितरन्ति) द्यूते प्रतिपक्षिणे-प्रतिपक्षिणं लक्षयित्वा-अक्षाः-अस्य कितवस्य द्यूतकर्मणि समन्ताद् धारयतः कितवस्य कामं जयं प्रयच्छन्ति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Puffed up in body and mind, the gambler moves to the gambling house asking, even assuring, himself in mind: Shall I win? I must, this time. And his dice, held and poised in hand to defeat his rival, inflame his fire to play and win, more and more.