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यदा॒दीध्ये॒ न द॑विषाण्येभिः परा॒यद्भ्योऽव॑ हीये॒ सखि॑भ्यः । न्यु॑प्ताश्च ब॒भ्रवो॒ वाच॒मक्र॑तँ॒ एमीदे॑षां निष्कृ॒तं जा॒रिणी॑व ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad ādīdhye na daviṣāṇy ebhiḥ parāyadbhyo va hīye sakhibhyaḥ | nyuptāś ca babhravo vācam akratam̐ emīd eṣāṁ niṣkṛtaṁ jāriṇīva ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । आ॒ऽदी॒ध्ये॒ । न । द॒वि॒षा॒णि॒ । ए॒भिः॒ । प॒रा॒यत्ऽभ्यः॑ । अव॑ । हीये॑ । सखि॑ऽभ्यः । निऽउ॑प्ताः । च॒ । ब॒भ्रवः॑ । वाच॑म् । अक्र॑त । एमि॑ । इत् । ए॒षा॒म् । निः॒ऽकृ॒तम् । जा॒रिणी॑ऽइव ॥ १०.३४.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:34» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:3» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्-आदीध्ये-एभिः-न दविषाणि) जब मैं सङ्कल्प करता हूँ कि इन पाशों से नहीं खेलूँगा (परायद्भ्यः सखिभ्यः-अवहीये) मुझ पर प्रभाव डालनेवाले आते हुए जुआरी साथियों से मैं दब जाता हूँ, (बभ्रवः-न्युप्ताः-च वाचम्-अक्रत) चमकते हुए जुए के पाशे फैंके हुए जब शब्द करते हैं, (एषां निष्कृतं जारिणी-इव-एमि) इन पाशों के सजे स्थान की ओर व्यभिचारिणी स्त्री की भाँति चला जाता हूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - जुए का व्यसन जब किसी को पड़ जाता है, उससे बचना कठिन हो जाता है। बचने की भावना या संकल्प होते हुए भी पुराने साथियों को और जुए के स्थान को देखकर जुए की ओर फिर चल पड़ता है। यह व्यसन बहुत बुरा है और इससे बचना चाहिये ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

व्यसन की प्रबलता व दुरन्तता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] उपरोक्त प्रकार से जुए से होनेवाली दुर्गति को देखकर (यद्) = जब (आदीध्ये) = यह ध्यान करता हूँ कि (एभिः) = इनसे (न दविषाणि) = [देविष्यामि] अब जुवा न खेलूँगा, इस जुए के परिणामरूप मैं (परायद्भ्यः) = एक-एक करके दूर जाते हुए (सखिभ्यः) = मित्रों से (अवहीये) = मैं हीन होता जाता हूँ। [२] परन्तु, (च) = और जब (न्युप्ता:) = द्यूत- फलक पर डाले हुए (बभ्रवः) = बभ्रु [Brown] वर्णवाले ये पासे वाचं अक्रत शब्द को करते हैं तो मैं (एषां निष्कृतम्) = इनके स्थान को (द्यूत) = व्यसन से अभिभूत हुआ हुआ मैं सब सङ्कल्पों को छोड़कर (एमि इत्) = आता ही हूँ। मैं फिर द्यूत सभा में पहुँच जाता हूँ, उसी प्रकार पहुँच जाता हूँ (इव) = जैसे कि (जारिणी) = कोई स्वच्छन्द आचरणवाली स्त्री संकेत स्थान की ओर अग्रसर होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- व्यसन दुरन्त हैं, इनका अन्त तो खराब है ही, पर इनका अन्त करना भी बड़ा कठिन है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्-आदीध्ये-एभिः न दविषाणि) यदा संकल्पयामि-एभिरक्षैर्न क्रीडिष्यामि (परायद्भ्यः सखिभ्यः अवहीये) परागच्छद्भ्यः स्वयं बलादागच्छद्भ्यः कितवेभ्योऽवस्थितो भवामि स्तब्धो भवामि (बभ्रवः-न्युप्ताः-च वाचम्-अक्रत) बभ्रुवर्णा अक्षाः क्षिप्ताश्च शब्दं कुर्वन्ति तदा (एषां निष्कृतं जारिणी-इव-एमि) एषामक्षाणां सम्पादितं स्थानं व्यभिचारिणीव गच्छामि ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When I realise and think I must not play with dice and must not be miserable, even then, having so decided, I succumb to the approaching dice as to seductive friends. Red and shining dice cast in the game rattle and resound, and I walk into the den like a woman stealing to her paramour.