पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु के निर्देश को सुनकर जुए से दूर रहने का निश्चय करता हुआ जुवारी प्रार्थना करता है कि हे अक्षो ! (मित्रं कृणुध्वम्) = हमारे साथ तो स्नेह ही रखो। मित्र जानकर हमें तो आप परेशान मत करो, हमारे पर तो आप जरा मेहरबानी ही रखें। (नः) = हमें (खलु) = निश्चय से (मृळता) = सुखी करनेवाले होइये । (नः) = हमें (धृष्णु) = पराभव करनेवाले (घोरेण) = अपने भयङ्कर रूप से (मा अभिचरत्) = मत प्राप्त होइये, अर्थात् कृपा करके आप हमारे से दूर ही रहिये । हमें आपके कारण दुर्गति में न पड़ना पड़े। [२] (वः मन्युः) = आपका क्रोध अथवा आपके कारण उत्पन्न हुआ- हुआ शोक (नु) = निश्चय से (अरातिः) = हमारा शत्रु ही (निविशताम्) = भोगे-प्राप्त करे । (बभ्रूणाम्) = भूरे वर्णवाले आपके (प्रसितौ) = बन्धन में (नु) = निश्चय से (अन्यः) = हमारे से भिन्न और ही कोई व्यक्ति (अस्तु) = हो। हमें आपका बन्धन न प्राप्त हो। हम जुए से सदा बचे रहें। यह व्यसन तो शत्रुओं को ही लगे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ये जुए के पासे हमारे पर तो कृपा ही करें। हमारे शत्रुओं को ही अपने बन्धन में बाँधे । इस सूक्त में ' द्यूत-व्यसन' का अत्यन्त उपयुक्त मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। ये जुए के पासे बड़े मादक हैं। [१] जुए से घर बिगड़ जाता है, [२] जुवारी का घरवाले भी आदर नहीं करते, [३] इसकी पत्नी भी दुर्गति को भोगती है, [४] यह जुआ एक दुरन्त व्यसन है, [५] हारने पर भी और इच्छा बढ़ती ही है, [६] ये पासे मधु सम्पृक्त हैं, हैं विनाशकारी, [७] त्रेपन पासों से यह खेला जाता है, [८] ये पासे छूने में ठण्डे होते हुए भी अत्यन्त सन्तापकारी होते हैं, [९] जुवारी ऋणी बन जाता है और चोरी में प्रवृत्त होता है। [१०] यह दरिद्रता की चरमसीमा पर पहुँच जाता है, [११] कटु अनुभव लेकर यह जुए से बिदा लेने का निश्चय करता है, [१२] कहता है कि प्रभु मुझे यही तो कहते हैं कि 'जुए को छोड़ो और कृषि को अपनाओ', [१३] सो हे पासो ! मेरे पर तो आप कृपा करो। मेरे शत्रु को ही आप प्राप्त होवो, [१४] इन द्यूत आदि व्यसनों के छोड़ने पर ही हम सब दिव्यताओं के स्वागत के लिये तैयार होंगे। दोनों सूक्तों का विषय 'विश्वेदेवा:' ही है। इन दिव्यगुणों से अपने को अलंकृत करने के कारण यह 'लुशः' [लुश् to adore ] नामवाला हुआ है। ऐसा बना रहने के लिये यह 'धानाक: 'धान आदि अन्नों का ही सात्त्विक भोजन करता है।