पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अयम्) = यह (अर्य:) = सबके स्वामी (सविता) = सबके प्रेरक प्रभु मे मुझे (तत् विचष्टे) = उस बात को कहते हैं कि (अक्षैः) = पासों से (मा दीव्यः) = जुआ मत खेल । (इत्) = निश्चय से (कृषिं कृषस्व) = खेती को ही कर । कोई भी मार्ग, जिससे कि हम एक ही दिन में धनी होना चाहते हैं, ठीक नहीं है। ऐसे मार्गों का प्रतीक ही यहाँ जूआ है। इन मार्गों से न चलना ही मनुष्य के लिये श्रेयस्कर है । कृषि प्रधान जीवन ही जीवन है। श्रम से धनार्जन के मार्गों का कृषि प्रतीक है। मनुष्य को पुरुषार्थ से ही धन कमाना चाहिए, यूँ ही धन प्राप्त की कामना हमें पौरुषशून्य बनाती है । [२] प्रभु कहते हैं कि कृषि से प्राप्त होनेवाले (वित्ते) = धन में ही (रमस्व) = तू रमण कर, आनन्द का अनुभव कर। उसी धन को (बहु मन्यमान:) = बहुत मानता हुआ तू चित्त में सन्तोष को धारण कर । (तत्र) = उस कृषि कर्म में (गावः) = गौ आदि पशुओं की कमी नहीं। वो तेरे जीवन के लिये आवश्यक दूध आदि पदार्थों के प्राप्त करानेवाले होंगे। हे (कितव) = जुए में प्रसित व्यक्ति तू यह समझ ले कि (तत्र) = उस कृषि कर्म में ही (जाया) = तेरी पत्नी भी तेरे लिये उत्तम सन्तानों को जन्म देनेवाली होती है, अर्थात् सब प्रकार से घर उत्तम बनाने के लिये आवश्यक है कि हम श्रम-प्रधान जीवन से धनार्जन की कामना करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अक्षों और कृषि में कृषि ही श्रेयस्कर है ।