पदार्थान्वयभाषाः - [१] चोरी के लिये जब उस घर में घुसता है तो (स्त्रियं दृष्ट्वाय) = स्त्री को देखकर भी (कितवम्) = इस कितव को (तताप) = सन्ताप अनुभव होता है। अपने कर्म में विघ्न होते समझ, वह घबरा उठता है (च) = और इसके अतिरिक्त (अन्येषां जायाम्) = दूसरों की पत्नी को देखकर वह सन्तप्त होता है। उसे अपनी पत्नी का स्मरण हो आता है और दोनों की स्थिति की तुलना करता हुआ, इस सारी स्थिति का अपने को कारण समझता हुआ घबरा जाता है। (सुकृतं योनिम्) = खूब परिष्कृत घर को देखकर भी वह सन्तप्त हो उठता है। इस घर की सुन्दर स्थिति और अपने घर की विपरीत स्थिति उसे भयङ्करता से व्याकुल कर देती है । [२] यह (वृषलः) = द्यूत में फँसकर धर्म का लोप करनेवाला 'वृषो हि भगवान् धर्मः तस्य यः कुरुते ह्यलं, वृषलं ते विदुर्देवाः' व्यक्ति आज ही पूर्वाह्णे = दिन के पूर्व भाग में १२ बजे से पहले (बभ्रून्) = भूरे रंग के (अश्वान्) = घोड़ों को (हि) = निश्चय से (युयुजे) = अपने रथ में जोते हुए था, (सः) = वही इस समय, रात्रि के समय शीत से पीड़ित हुआ (अग्नेः अन्ते) = आग के समीप (पपाद) = आकर पड़ा हुआ है। अपनी सारी सम्पत्ति को जुए में गँवाकर इस प्रकार निर्धन स्थिति में हो गया है कि शीत निवारण के लिये कपड़ों से भी वञ्चित है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जुवारी की दुर्गति का स्वरूप यह है कि उसके पास सर्दी को दूर करने के लिये कपड़े भी नहीं रहे ।