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स्त्रियं॑ दृ॒ष्ट्वाय॑ कित॒वं त॑तापा॒न्येषां॑ जा॒यां सुकृ॑तं च॒ योनि॑म् । पू॒र्वा॒ह्णे अश्वा॑न्युयु॒जे हि ब॒भ्रून्त्सो अ॒ग्नेरन्ते॑ वृष॒लः प॑पाद ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

striyaṁ dṛṣṭvāya kitavaṁ tatāpānyeṣāṁ jāyāṁ sukṛtaṁ ca yonim | pūrvāhṇe aśvān yuyuje hi babhrūn so agner ante vṛṣalaḥ papāda ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्त्रिय॑म् । दृ॒ष्ट्वाय॑ । कि॒त॒वम् । त॒ता॒प॒ । अ॒न्येषा॑म् । जा॒याम् । सुऽकृ॑तम् । च॒ । योनि॑म् । पू॒र्वा॒ह्णे । अश्वा॑न् । यु॒यु॒जे । हि । ब॒भ्रून् । सः । अ॒ग्नेः । अन्ते॑ । वृ॒ष॒लः । प॒पा॒द॒ ॥ १०.३४.११

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:34» मन्त्र:11 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:5» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:11


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कितवम्) जुआरी मनुष्य (स्त्रियं दृष्ट्वाय) अपनी दुःखित स्त्री को देखकर (अन्येषां जायां सुकृतं योनिं च) अन्य जनों की सुखयुक्त पत्नी को और सुशोभित घर को देखकर (तताप) पीड़ित होता है (पूर्वाह्णे बभ्रून्-अश्वान् युयुजे) प्रातः ही पोषक इन्द्रियप्राणों से युक्त होता है, सावधान होता है, तो (सः वृषलः-अग्नेः-अन्ते पपाद) वह धर्म का लोप करनेवाला जुआरी शोकार्त हुआ परमात्मा की शरण में जाता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - जुआरी जुए के परिणाम से अपने पत्नी को दुखी देखता हुआ और दरिद्रता का अनुभव करता हुआ तथा अन्यों की पत्नी और घरों को सुखी सम्पन्न पाता हुआ पश्चात्ताप करता है, तो रात्रि के पश्चात् प्रातः सावधान हुआ अपने उत्थानार्थ परमात्मा का स्मरण करता है ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दरिद्रता की चरमसीमा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] चोरी के लिये जब उस घर में घुसता है तो (स्त्रियं दृष्ट्वाय) = स्त्री को देखकर भी (कितवम्) = इस कितव को (तताप) = सन्ताप अनुभव होता है। अपने कर्म में विघ्न होते समझ, वह घबरा उठता है (च) = और इसके अतिरिक्त (अन्येषां जायाम्) = दूसरों की पत्नी को देखकर वह सन्तप्त होता है। उसे अपनी पत्नी का स्मरण हो आता है और दोनों की स्थिति की तुलना करता हुआ, इस सारी स्थिति का अपने को कारण समझता हुआ घबरा जाता है। (सुकृतं योनिम्) = खूब परिष्कृत घर को देखकर भी वह सन्तप्त हो उठता है। इस घर की सुन्दर स्थिति और अपने घर की विपरीत स्थिति उसे भयङ्करता से व्याकुल कर देती है । [२] यह (वृषलः) = द्यूत में फँसकर धर्म का लोप करनेवाला 'वृषो हि भगवान् धर्मः तस्य यः कुरुते ह्यलं, वृषलं ते विदुर्देवाः' व्यक्ति आज ही पूर्वाह्णे = दिन के पूर्व भाग में १२ बजे से पहले (बभ्रून्) = भूरे रंग के (अश्वान्) = घोड़ों को (हि) = निश्चय से (युयुजे) = अपने रथ में जोते हुए था, (सः) = वही इस समय, रात्रि के समय शीत से पीड़ित हुआ (अग्नेः अन्ते) = आग के समीप (पपाद) = आकर पड़ा हुआ है। अपनी सारी सम्पत्ति को जुए में गँवाकर इस प्रकार निर्धन स्थिति में हो गया है कि शीत निवारण के लिये कपड़ों से भी वञ्चित है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जुवारी की दुर्गति का स्वरूप यह है कि उसके पास सर्दी को दूर करने के लिये कपड़े भी नहीं रहे ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कितवम्) कितवो द्यूतव्यसनी जनः “विभक्तिव्यत्ययश्छान्दसः” (स्त्रियं दृष्ट्वाय) स्वकीयपत्नीं दुःखितां दृष्ट्वा (अन्येषां जायां सुकृतं योनिं च) अन्येषा जनानां पत्नीं सुखयुक्तां सुशोभितगृहं च “योनिः गृहनाम” [निघं०३।४] दृष्ट्वेति सम्बन्धः (तताप) तप्यते पीडितो भवति (पूर्वाह्णे-बभ्रून्-अश्वान् युयुजे) प्रातरेव पोषकान् इन्द्रियप्राणान् “इन्द्रियाणि हयानाहुः” [कठो १।३।४] युनक्ति (सः-वृषलः-अग्नेः-अन्ते पपाद) स धर्मस्य लोपयिता शोकार्तः सन्-अग्रणायकस्य परमात्मनः समीपे-शरणे गतो भवति ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The gambler suffers when he sees his wife, and he regrets when he sees another’s wife well settled, their noble acts and comfortable home. Yet again in the forenoon he grabs the tempting dice as a warrior takes to his steed, but when the fire is gone cold, he falls down broken and farlorn.