पदार्थान्वयभाषाः - प्रभु जीव से कहते हैं कि (स) = वह 'देवतम- अरति व विश्वा' बननेवाला तू (आ) = सब ओर से व सब प्रकार से (वक्षि) = देवों को अपने अन्दर प्राप्त कराता है, अर्थात् तू गुणों का कारण करनेवाला बनता है, (च) = और (नः) = हमारी (महि) = पूजा में (आसत्सि) = आकर स्थित होता है [मह् पूजायाम्, भावे क्विप्] । वस्तुतः प्रातः - सायं प्रभु पूजाएँ स्थित होना दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए सहायक है और दिव्यगुणों का वर्धन प्रभु-पूजन की वृत्ति को बढ़ाता है । इस प्रकार प्रभु-पूजन व दिव्यगुणों की प्राप्ति परस्पर उपकारक होते हैं । तू (युवत्योः) = परस्पर विकास वाली (दिवस्पृथि) = मस्तिष्क व शरीर के विषय में (अरतिः) = [ऋ गतौ] निरन्तर क्रियाशील होता है । अर्थात् मस्तिष्क व शरीर के लिये तू सदा प्रयत्न करता है, तू मस्तिष्क को ज्ञानोज्ज्वल बनाता है तो शरीर को दृढ़ बनाने का प्रयत्न करता है एक की ही उन्नति में नहीं लगा रहता । परन्तु साथ ही 'अरति:' तू इनमें रति व ममता वाला नहीं हो जाता, इनमें तू फँसता नहीं। इस प्रकार बना हुआ तू ('अग्निः') = अग्रेणी है, अपने को उन्नत करनेवाला है। ('सु-तुकः') = [तुक् गतौ] उत्तम गतिवाला है, वस्तुतः यह सद् आचरण है । यह तू (सुतकेभिः अश्वैः) = उत्तम गति वाले इन्द्रिय रूप अश्वों से सदा उत्तम क्रियाओं में लगी हुई इन्द्रियों से और क्रियाओं में लगे रहने के कारण ही (रभस्वद्भिः) = रभस्, अर्थात् शक्ति वाली इन्द्रियों से (रभस्वान्) = शक्तिशाली बना हुआ तू इह यहाँ हमारे पास (आगम्याः) = आत्मा वाला बन । शक्तिशाली ही प्रभु को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्य:'- यह आत्मा निर्बलों को प्राप्त नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु उसे प्राप्त होता है जो कि - [क] दिव्यगुणों को धारण करता है, [ख] पूजा में प्रातः सायं स्थित होता है, [ग] शरीर व मस्तिष्क दोनों को उन्नत करता है, [घ] गतिवाला तथा उत्तम गतिवाला बनता है । [ङ] उत्तम गतिशील व शक्तिशाली इन्द्रियों से शक्तिशाली होता है । इस शक्तिशाली को ही प्रभु की प्राप्ति होती है। इस सूक्त का प्रारम्भ इस रूप में है कि - ज्ञानदीप्त हों और अकल्याणी वाणी से दूर हों, [१] शुभ वेदवाणी को अपनाएँ जिससे हमारा ज्ञान बढ़े, [२] हम भद्र बनें, सदा कल्याणी बुद्धि को अपनाएँ, [३] प्रभु की प्रेरणा रूप प्रकाश में मार्ग को देखते हुए मार्गभ्रष्ट होने से बचें, [४] प्रभु की प्रेरणा को सुनते हुए 'तेजिष्ठ, क्रीडुमान् व वर्षिष्ठ' बनें, [५] इस प्रभु की वाणी को सुनने से ही हम देवतम अरति व विश्वा बनेंगे, [६] इस प्रेरणा के अनुसार चलते हुए ही 'रभस्वान्' शक्तिशाली होंगे और प्रभु को प्राप्त होने के योग्य हो जाएँगे, [७] इन लोगों के लिये प्रभु इस संसार रूप मरुस्थल में तृषा शान्ति की साधनभूत 'प्रपा' के समान होंगे-