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देवता: अग्निः ऋषि: त्रितः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

स्व॒ना न यस्य॒ भामा॑स॒: पव॑न्ते॒ रोच॑मानस्य बृह॒तः सु॒दिव॑: । ज्येष्ठे॑भि॒र्यस्तेजि॑ष्ठैः क्रीळु॒मद्भि॒र्वर्षि॑ष्ठेभिर्भा॒नुभि॒र्नक्ष॑ति॒ द्याम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

svanā na yasya bhāmāsaḥ pavante rocamānasya bṛhataḥ sudivaḥ | jyeṣṭhebhir yas tejiṣṭhaiḥ krīḻumadbhir varṣiṣṭhebhir bhānubhir nakṣati dyām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्व॒नाः । न । यस्य॑ । भामा॑सः । पव॑न्ते । रोच॑मानस्य । बृ॒ह॒तः । सु॒ऽदिवः॑ । ज्येष्ठे॑भिः । यः । तेजि॑ष्ठैः । क्री॒ळु॒मत्ऽभिः॑ । वर्षि॑ष्ठेभिः । भा॒नुऽभिः॑ । नक्ष॑ति । द्याम् ॥ १०.३.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:3» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:31» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य बृहतः-रोचमानस्य सुदिवः) जिस महान् प्रकाशमान उत्तम प्रकाशमान द्युस्थानवाले सूर्य के (भामासः) प्रकाशतरङ्ग (स्वनाः-न पवन्ते) स्तुतिवचनवाले जैसे गति करते हैं-प्राप्त होते हैं और (यः) जो सूर्य (ज्येष्ठेभिः) उन श्रेष्ठों (तेजिष्ठैः) अतितेजस्वियों (क्रीडुमद्भिः) क्रीडा वालों-क्रीडा से करते हुओं (वर्षिष्ठेभिः) बढ़े-चढ़े (भानुभिः-द्यां नक्षति) स्वज्योतियों द्वारा द्युलोक को व्याप्त होता है, उस सूर्य को सब विशेषरूप से जानें ॥५॥
भावार्थभाषाः - प्रकाशमान सूर्य की प्रकाशतरङ्ग संसार में सर्वत्र क्रीडा सी करती हुई गति करती हैं, उपासक जैसे परमात्मा की स्तुति करते हुए संसार में विचरते हैं और अन्त में मोक्ष में विराजते हैं, ऐसे विद्यासूर्य विद्वान् की ज्ञानतरङ्ग संसार में फैला करती हैं। ऐसा विद्या-सूर्य विद्वान् का परमधाम विद्याधाम-विद्याप्रतिष्ठान है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु की वाणी

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) = जिस प्रभु की (भामासः) = ज्ञानदीप्तियाँ (स्वनाः न) = स्वनों के समान हैं, प्रभु का प्रकाश क्या है ? यह अन्त:स्थित प्रभु की प्रेरणात्मक वाणी है। इस वाणी को सुनना ही 'अनाहत' है । आघात से उत्पन्न होने के कारण ये सब शब्द 'आहत' कहलाते हैं। ड्रम पर ड्रमष्टिक से आघात करते हैं और शब्द उत्पन्न होता है, हम जो शब्द बोलते हैं वह भी प्रारम्भ में 'मनः कायाग्नि- माहन्ति' मन का कायाग्नि पर आघात होने से ही उत्पन्न होता है। यदि (रोचमानस्य) = उस तेजस्विता से चमकनेवाले (बृहतः) = अत्यन्त विशाल (सुदिवः) = उत्तम ज्ञान की ज्योति वाले प्रभु की इन वाणियों को हम सुनते हैं तो ये वाणियाँ (पवन्ते) = हमारे जीवन को पवित्र करनेवाली होती हैं । हमारे जीवनों को पवित्र करके ये वाणियाँ हमें भी उस पिता प्रभु की तरह ही 'रोचमान, बृहत् तथा सुदिव' बनाती हैं। हमारे शरीर नीरोग होकर तेजस्वी होते हैं, हमारे मन निर्मल होकर बृहत् व विशाल होते हैं, हमारी बुद्धियाँ भी निर्मल होकर ज्ञानज्योति से चमक उठती हैं । प्रभु इन (भानुभिः) = ज्ञानदीप्तियों से यह प्रभु की वाणी को सुननेवाला व्यक्ति (द्याम् नक्षति) = द्युलोक की ओर जाता है । पृथिवी से ऊपर उठकर अन्तरिक्ष में, अन्तरिक्ष से ऊपर उठकर यह द्युलोक में पहुँचता है। यहाँ इस सूर्यसम से आगे बढ़ता हुआ यह उस अमृत अव्ययात्मा ब्रह्म को प्राप्त करता है 'सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा' । 'कौन उस प्रभु को प्राप्त करता है अथवा द्युलोक की ओर जाता है ?' इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि (यः) = जो उन ज्ञान दीतियों से युक्त होता है जो (ज्येष्ठेभिः) = [उपलक्षिता] हमें ज्येष्ठ बनानेवाली हैं, जिन ज्ञान दीप्तियों से हमारा जीवन श्रेष्ठ बनता है। श्रेष्ठता का अभिप्रायः स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि - (तेजिष्ठैः) = ये हमें अत्यन्त तेजस्वी बनाती हैं, (क्रीडुमद्भिः) = युक्ताहार विहार वाला बनाकर ये ज्ञानदीप्तियाँ जहाँ हमें शरीर में नीरोग व तेजस्वी बनाती हैं वहाँ हमारे मनों को भी निर्मल बनाकर ये हमें 'क्रीडुमान्' बनाती है। संसार हमारे लिये एक 'क्रीडु' खिलौना होता है। इस खिलौनेवाले हम होते हैं। हम प्रत्येक घटनाएँ आनन्द का अनुभव करने लगते हैं। पराजय को भी एक खिलाड़ी की मनोवृत्ति से ही ग्रहण करते हैं । हानि-लाभ हमें क्षुब्ध नहीं कर देते । ये ज्ञानदीप्तियाँ (वर्षष्ठेभिः) = ज्ञानवृद्ध तो हमें बनाती ही हैं। खूब उत्तम ज्ञान को प्राप्त कराके ये हमारे लिए सब सुखों का वर्षण करनेवाली होती हैं । एवं 'तेजिष्ठ क्रीडुमान् हैं। व वर्षिष्ठ' बनकर हम सचमुच ज्येष्ठ बनते हैं, प्रभु की ज्ञानदीसियों का यही हमारे पर अनुग्रह है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का प्रकाश 'आत्मा का शब्द' है [voice of conscious] इसे हम सुनते हैं तो 'रोचमान, बृहत् व सुदिव' बनते हैं, 'तेजिष्ठ, क्रीडुमान्, वर्षिष्ठ' बनकर ज्येष्ठ बनते हैं और द्युलोक को प्राप्त करते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य बृहतः-रोचमानस्य सुदिवः) यस्य महतः प्रकाशमानस्य शोभनद्युलोकवतः सूर्यस्य (भामासः) प्रकाशतरङ्गाः (स्वनाः-न पवन्ते) स्वनवन्तः शब्दवन्तः स्तुतिवचनवन्तः-इव स्वनः शब्दस्तद्वन्तः, अकारो मत्वर्थीयः, गच्छन्ति (यः) यश्च सूर्यः (ज्येष्ठेभिः) ज्येष्ठैः (तेजिष्ठैः) तेजस्वितमैः (क्रीडुमद्भिः) क्रीडावद्भिः (वर्षिष्ठेभिः) वृद्धतमैः (भानुभिः-द्यां नक्षति) स्वज्योतिधर्मैः द्युलोकमाप्नोति तं सर्वे विजानन्तु ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, beauteous and blissful, mighty and sublime presence whose brilliant rays and reflections radiate, resound and flow like roaring winds and thunderous lightning illumines the heavens with its highest lustre and with its sportive and most potent splendours reaches the summit of refulgent space.