पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) = जिस प्रभु की (भामासः) = ज्ञानदीप्तियाँ (स्वनाः न) = स्वनों के समान हैं, प्रभु का प्रकाश क्या है ? यह अन्त:स्थित प्रभु की प्रेरणात्मक वाणी है। इस वाणी को सुनना ही 'अनाहत' है । आघात से उत्पन्न होने के कारण ये सब शब्द 'आहत' कहलाते हैं। ड्रम पर ड्रमष्टिक से आघात करते हैं और शब्द उत्पन्न होता है, हम जो शब्द बोलते हैं वह भी प्रारम्भ में 'मनः कायाग्नि- माहन्ति' मन का कायाग्नि पर आघात होने से ही उत्पन्न होता है। यदि (रोचमानस्य) = उस तेजस्विता से चमकनेवाले (बृहतः) = अत्यन्त विशाल (सुदिवः) = उत्तम ज्ञान की ज्योति वाले प्रभु की इन वाणियों को हम सुनते हैं तो ये वाणियाँ (पवन्ते) = हमारे जीवन को पवित्र करनेवाली होती हैं । हमारे जीवनों को पवित्र करके ये वाणियाँ हमें भी उस पिता प्रभु की तरह ही 'रोचमान, बृहत् तथा सुदिव' बनाती हैं। हमारे शरीर नीरोग होकर तेजस्वी होते हैं, हमारे मन निर्मल होकर बृहत् व विशाल होते हैं, हमारी बुद्धियाँ भी निर्मल होकर ज्ञानज्योति से चमक उठती हैं । प्रभु इन (भानुभिः) = ज्ञानदीप्तियों से यह प्रभु की वाणी को सुननेवाला व्यक्ति (द्याम् नक्षति) = द्युलोक की ओर जाता है । पृथिवी से ऊपर उठकर अन्तरिक्ष में, अन्तरिक्ष से ऊपर उठकर यह द्युलोक में पहुँचता है। यहाँ इस सूर्यसम से आगे बढ़ता हुआ यह उस अमृत अव्ययात्मा ब्रह्म को प्राप्त करता है 'सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा' । 'कौन उस प्रभु को प्राप्त करता है अथवा द्युलोक की ओर जाता है ?' इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि (यः) = जो उन ज्ञान दीतियों से युक्त होता है जो (ज्येष्ठेभिः) = [उपलक्षिता] हमें ज्येष्ठ बनानेवाली हैं, जिन ज्ञान दीप्तियों से हमारा जीवन श्रेष्ठ बनता है। श्रेष्ठता का अभिप्रायः स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि - (तेजिष्ठैः) = ये हमें अत्यन्त तेजस्वी बनाती हैं, (क्रीडुमद्भिः) = युक्ताहार विहार वाला बनाकर ये ज्ञानदीप्तियाँ जहाँ हमें शरीर में नीरोग व तेजस्वी बनाती हैं वहाँ हमारे मनों को भी निर्मल बनाकर ये हमें 'क्रीडुमान्' बनाती है। संसार हमारे लिये एक 'क्रीडु' खिलौना होता है। इस खिलौनेवाले हम होते हैं। हम प्रत्येक घटनाएँ आनन्द का अनुभव करने लगते हैं। पराजय को भी एक खिलाड़ी की मनोवृत्ति से ही ग्रहण करते हैं । हानि-लाभ हमें क्षुब्ध नहीं कर देते । ये ज्ञानदीप्तियाँ (वर्षष्ठेभिः) = ज्ञानवृद्ध तो हमें बनाती ही हैं। खूब उत्तम ज्ञान को प्राप्त कराके ये हमारे लिए सब सुखों का वर्षण करनेवाली होती हैं । एवं 'तेजिष्ठ क्रीडुमान् हैं। व वर्षिष्ठ' बनकर हम सचमुच ज्येष्ठ बनते हैं, प्रभु की ज्ञानदीसियों का यही हमारे पर अनुग्रह है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का प्रकाश 'आत्मा का शब्द' है [voice of conscious] इसे हम सुनते हैं तो 'रोचमान, बृहत् व सुदिव' बनते हैं, 'तेजिष्ठ, क्रीडुमान्, वर्षिष्ठ' बनकर ज्येष्ठ बनते हैं और द्युलोक को प्राप्त करते हैं।