शिव सखा द्वारा मार्गदर्शन
पदार्थान्वयभाषाः - गतमन्त्र के अनुसार जब हम प्रभु में स्थित होने के लिये यत्नशील होते हैं तो (अस्य) = इस (बृहतः) = सदा से वर्तमान प्रभु की (यामासः) [यान्ति गच्छन्ति] = सब क्रियाएँ (न वग्नून्) = व्यर्थ की बहुत बातें न करनेवाले पुरुषों को (इन्धाना:) = दीप्त करनेवाली होती हैं। बहुत न बोलनेवाले मुनि ही [मौनात्] उस सनातन गुरु से ज्ञान प्राप्ति को प्राप्त कर पाते हैं। जैसे एक आचार्य की सब क्रियाएँ प्रिय अन्तेवासी के ज्ञान की वृद्धि के लिये होती हैं, उसी प्रकार इस प्राचीन आचार्य प्रभु की क्रियाएँ प्रिय भक्त के ज्ञान की वृद्धि के लिए होती हैं । (अग्नेः) = गतिशील जीव के (सख्युः) = मित्र और (शिवस्य) = सदा कल्याण करनेवाले अथवा [ शो तनूकरणे] अज्ञानान्धकार को दूर करनेवाले, (ईड्यस्य) = स्तुति के योग्य (वृष्णः) = सब सुखों की वर्षा करनेवाले (बृहतः) = सदा अपने मित्र का वर्धन करनेवाले [अन्तर्भावितण्यर्थो बृहि धातुः ] (स्वास:) = उत्तम मुख वाले [ स्वास्यस्य] अथवा [सु + आ + अस्-क्षेपणे] सब बुराइयों को हमारे से दूर फेंकनेवाले उस प्रभु की (भामासः) = ज्ञानदीप्तियाँ (यामन्) = इस जीवनयात्रा में (अक्तवः) = ज्ञान की रश्मियों के रूप में (चिकित्रे) = जानी जाती हैं। इन ज्ञान रश्मियों के प्रकाश में हमें जीवनयात्रा का मार्ग ठीक रूप में दिखता है। ये प्रकाश की किरणें हमें मार्गभ्रष्ट नहीं होने देती । प्रभु की यह सहायता प्राप्त उन्हीं को होती है जो कि अग्निप्रगतिशील हों । आलसी को प्रभु की सहायता नहीं प्राप्त होती । प्रभु 'अग्नि' के ही मित्र हैं सभी देव यत्नशील पुरुष के ही मित्र होते हैं 'न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः' [God helps those who help themselves] सम्भव है कि संसार के अन्य मित्र तो शक्ति व ज्ञान की कमी के कारण चाहते हुए भी हमारा भला न कर सकें अथवा बुरा कर बैठें, परन्तु ये प्रभु सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान् होने से 'शिव' ही 'शिव' हैं, वे सदा हमारा कल्याण करते हैं और प्रभु का कल्याण करने का क्रम यही है कि वे हमारे अज्ञानान्धकार को क्षीण कर देते हैं । सो प्रभु जीव के लिये 'ईड्य' हैं । प्रभु के गुणों का स्मरण करता हुआ जीव अपने लिये एक आदर्श को सदा अपने सामने उपस्थित कर पाता है, और प्रगतिशील होता है। प्रभु का जीव के वर्धन का यही क्रम है। प्रभु जीव के ज्ञान को बढ़ाते हैं, इसी प्रकार वे उस पर सुखों का वर्षण करते हैं व उसको उन्नत करते हैं । प्रभु के मुख से शुभ ज्ञान की वाणियों का ही उच्चारण होता है। प्रभु के मुख से उच्चारित ये प्रेरणाएँ हमारे जीवनों को दीप्त करती हैं। ये ही हमारे जीवनमार्ग को दिखलाने के लिये प्रकाश की किरणें होती
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस शिव सखा का स्तवन करते हुए उसकी प्रेरणाओं के प्रकाश में मार्ग को देखते हुए जीवनयात्रा में पथभ्रष्ट होने से बचें।