पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) = जब (मर्त्यासः) = संसार के विषयों के ही पीछे मरनेवाले अथवा मरा-सा जीवन बितानेवाले (पाकत्रा) = [पक्तव्येन] परिपक्व करने के योग्य मनसा मन से युक्त अर्थात् हीन ज्ञान वाले नासमझ तथा (दीनदक्षा:) = आर्थिक शैथिल्य व शरीर की निर्बलता के कारण हीन उत्साह वाले पुरुष होते हैं तो वे यज्ञस्य न मन्वते यज्ञ का विचार नहीं करते। अज्ञानी व क्षीणसामर्थ्य मरे से पुरुषों में यज्ञों की भावना का उदय नहीं होता। उत्तम कर्मों व यज्ञादि का विचार तभी उत्पन्न होता है जब कि मनुष्य परिपक्व बुद्धि व यज्ञादि के लाभों को समझनेवाला होता है तथा आर्थिक व शारीरिक स्थिति के ठीक होने से पूर्ण उत्साह से युक्त होता है । (तत्) = [ then ] तब (अग्नि:) = प्रगतिशील पुरुष (होता) = सदा देकर यज्ञशेष को खाने की मनोवृत्ति वाला, (क्रतुविद्) = यज्ञों के महत्त्व को समझनेवाला, (विजानन्) = विशिष्ट ज्ञानवाला पुरुष (यजिष्ठ:) = अधिक से अधिक यज्ञशील होता है और (ऋतुश:) = [ऋतौ] ऋतु ऋतु में, सदा (देवान् यजाति) = देवयज्ञ करनेवाला होता है आधिदैविक क्षेत्र में यह देवयज्ञ 'अग्निहोत्र' है, अग्नि में डाली हुई आहुति सूर्य तक पहुँचकर सारे देवों को प्राप्त होती है, सम्पूर्ण वायुमण्डल शुद्ध होकर ठीक समय पर वर्षादि के होने से रोगों व अकाल का भय नहीं रहता । आधिभौतिक क्षेत्र में यह देवयज्ञ - विद्वानों का संग व सेवा है। इससे मनुष्य के ज्ञान का वर्धन होता है और जीवन उत्तम बनता है। अध्यात्म में यह देवयज्ञ, 'हृदयस्थ प्रभु के साथ मेल' है । इस मेल से मनुष्य पवित्र व शान्त बनता है। मनुष्य के अन्दर इस देवयज्ञ से एक अतिमानव शक्ति का उद्गम होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ' अजानन्' पुरुष यज्ञों में प्रवृत्त नहीं होता, इस अप्रवृति का कारण आर्थिक दुर्बलता व उत्साह की कमी भी है। विजानन् पुरुष सदा यज्ञशील होता है।