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देवता: अग्निः ऋषि: त्रितः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

आ दे॒वाना॒मपि॒ पन्था॑मगन्म॒ यच्छ॒क्नवा॑म॒ तदनु॒ प्रवो॑ळ्हुम् । अ॒ग्निर्वि॒द्वान्त्स य॑जा॒त्सेदु॒ होता॒ सो अ॑ध्व॒रान्त्स ऋ॒तून्क॑ल्पयाति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā devānām api panthām aganma yac chaknavāma tad anu pravoḻhum | agnir vidvān sa yajāt sed u hotā so adhvarān sa ṛtūn kalpayāti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । दे॒वाना॑म् । अपि॑ । पन्था॑म् । अ॒ग॒न्म॒ । यत् । श॒क्नवा॑म । तत् । अनु॑ । प्रऽवो॑ळ्हुम् । अ॒ग्निः । वि॒द्वान् । सः । य॒ज॒त् । सः । इत् । ऊँ॒ इति॑ । होता॑ । सः । अ॒ध्व॒रान् । सः । ऋ॒तून् । क॒ल्प॒याति ॥ १०.२.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:2» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:30» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवानाम्-अपि पन्थाम्) द्युस्थानी ग्रहों के भी मार्ग-गतिक्रम को (आ-आगन्म) हम जान लें (यत्-शक्नवाम) जिससे कि जानने में समर्थ होवें (तत्-अनु प्रवोढुम्) उसके अनुसार प्रचार अनुष्ठान करने का आरम्भ कर सकें (सः-अग्निः-विद्वान्) वह सूर्य अग्नि ग्रहों के मार्ग को जनाता हुआ (सः-यजात्) हमें ज्योतिर्विद्या में जोड़ देता है (स-इत्) वह ही (होता) ज्योतिर्विज्ञान का सम्पादक य निमित्त है (सः-अध्वरान् सः-ऋतून् कल्पयाति) वह समस्त जीवों में प्राणों का और समस्त स्थानों में ऋतुओं का सञ्चार करता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - सूर्य का ज्ञान मानव के लिये अत्यन्त आवश्यक है। आकाश में गृह तारों के गतिमार्गों के ज्ञान का निमित्त, ज्योतिर्विद्या का आधार तथा जीवों में प्राणों का प्रेरक एवं लोकों पर ऋतु सञ्चार का कारण वही सूर्य है। विद्यासूर्य विद्वान् से दिव्य जीवन के मार्ग को जानना चाहिये और प्राणविद्या तथा काल-ज्ञान को ग्रहण करना चाहिये ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देव-यान

पदार्थान्वयभाषाः - गतमन्त्रों के अन्तिम शब्दों के अनुसार देवों के साथ हमारा संग हो । उनकी ज्ञानचर्चाओं से हम विवेक को प्राप्त करें, धर्माधर्म को जानें। तथा (देवानाम्) = उन देवों के (पन्थाम्) = मार्ग को (आ अगन्म अपि) = चलने का भी प्रयत्न करें। देवताओं के मार्ग का अनुसरण करें । (यत् शक्नवाम) = जितना भी कर सकें (तदनु) = उन देवताओं के अनुसार ही (प्रवोढुम्) = कार्यभार को वहन करने के लिये यत्नशील हों । अर्थात् यथाशक्ति हम देवों के मार्ग से ही चलें। उनसे किये जाते हुए कार्यों को ही करें। इस प्रकार देवानुसरण करनेवाला व्यक्ति ही (अग्निः) = अग्रेणी- अपने को अग्रस्थान में प्राप्त करानेवाला होता है। यही (विद्वान्) = ज्ञानी बनता है । (स) = वह (यजात्) = यज्ञशील होता है, (उ) = और (स) = वह (इत्) = निश्चय से (होता) = दानपूर्वक अदन करता है, (सः) = वह (अध्वरान्) = सदा हिंसा रहित कर्मों को कल्पयाति तथा इन हिंसारहित कर्मों को करनेवाला यह (ऋतून्) = ऋतुओं को (कल्पयाति) = शक्तिशाली बनाता है। इसके लिये सारे समय सामर्थ्य को देनेवाले होते हैं। अहिंसा के अनुपात में ही इसकी शक्ति बढ़ जाती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम देवों के मार्ग पर चलें । यथाशक्ति उनके कर्मों का अनुसरण करें। उन्नतिशील ज्ञानी यज्ञशील व होता बनें। हिंसारहित कर्मों को करते हुए अपने लिये सब कालों को शक्ति सम्पन्न बनाएँ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवानाम्-अपि पन्थाम्) द्युस्थानभवानां चन्द्रादिग्रहोपग्रहाणां खल्वपि “देवः-द्युस्थानो भवतीति वा” [निरु० ७।१६] पन्थानं मार्गं गगनक्रमं पन्थानमिति स्थाने पन्थामिति छान्दसः प्रयोगः (आ-आगन्म) जानीयाम (यत्-शक्नवाम) यतो ज्ञातुं समर्था भवेम (तत्-अनु प्रवोढुम्) तदनुसरन्तः प्रवाहयितुं प्रचारयितुं कार्येऽनुष्ठातुमारभेमहि-इत्यर्थः (सः-अग्निः-विद्वान्) स एव सूर्योऽग्निर्वेदयन्-द्युस्थानानां ग्रहाणां मार्गं ज्ञापयन् सन् (यजात्) ज्योतिर्विद्यायां सङ्गमयेत्-‘अन्तर्गतणिजर्थः (स-इत्) सः “सुपां सुलुक्०” [अष्टा० ७।१।३९] इति सोर्लुक्, एव (होता) ज्योतिर्विज्ञानस्य सम्पादननिमित्तीभूतः (सः-अध्वरान् सः-ऋतून् कल्पयाति) सः प्राणान् “प्राणोऽध्वरः” [श० ७।३।१।५] ऋतूंश्च सम्पादयति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let us follow the path of the divinities, sagely scholars, stars and planets as far as we can and do that in proper order so that we may be able to continue: Agni knows, the scholar knows, the sun is the base of knowledge in relation to its systemic position, that is the high priest of the solar system, that controls the harmonious movements of the planets, that ordains the pattern of the seasons.$(Let the sun be the base of our knowledge of the stars and planets in our pursuit of yajnic astronomy. Similarly let the sagely scholar who knows the science of yajna be our guide in our studies and our actions.)