पदार्थान्वयभाषाः - हे (यविष्ठ) = बुराई को अपने से दूर करनेवाले तथा अच्छाई को अपने से संयुक्त करनेवाले जीव ! (उशतः) = तेरा हित चाहनेवाले (देवान्) = माता, पिता, आचार्य, अतिथि आदि देवों को (पिप्रीहि) = तू अपने उत्तम कर्मों से प्रीणित करनेवाला बन । उनके कहने में चलता हुआ तू उनकी प्रसन्नता का कारण बन । हृदयस्थ उस महान् देव प्रभु की प्रेरणा को सुन तथा तदनुसार जीवन को चला। (विद्वान्) = इनके सम्पर्क में ज्ञानी बनकर (ऋतुपते) = हे ऋतुओं के पति अर्थात् समयानुसार नियमितता से कार्य करनेवाले जीव ! तू (इह) = इस मानव जीवन में (ऋतून् यज) = ऋतुओं की अनुकूलता के लिये यज्ञशील हो। उत्तम कर्मों से माता-पिता आदि को प्रीणित कर, ज्ञानी बन और यज्ञशील हो । अब (ये) = जो (दैव्याः) = देव की ओर चलनेवाले, प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होनेवाले (ऋत्विजः) = ऋतु- ऋतु में यज्ञशील पुरुष हैं (तेभिः) = उनके सम्पर्क में रहता हुआ (त्वम्) = तू (अग्ने) = हे प्रगतिशील जीव ! (होतॄणाम्) = होताओं में, दानपूर्वक अदन करने वालों में (आयजिष्ठः) = सब प्रकार से सर्वाधिक यज्ञशील हो । वस्तुतः हम जिन भी लोगों के सम्पर्क में आते हैं उन जैसे ही जीवन वाले बन जाते हैं। अच्छों के सम्पर्क में अच्छे और बुरों के सम्पर्क में बुरे । यहाँ देव ऋत्विज् लोगों के सम्पर्क में आकर हम भी सर्वाधिक यज्ञशील बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम बुराई को अपने से दूर करके तथा अच्छाई को अपने साथ संगत करके माता, पिता, आचार्य आदि देवों को प्रसन्न करें। हमारे सब कार्य समय पर हों। उत्तम लोगों के सम्पर्क में आकर हम उत्तम बनें।