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स॒मा॒नो मन्त्र॒: समि॑तिः समा॒नी स॑मा॒नं मन॑: स॒ह चि॒त्तमे॑षाम् । स॒मा॒नं मन्त्र॑म॒भि म॑न्त्रये वः समा॒नेन॑ वो ह॒विषा॑ जुहोमि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

samāno mantraḥ samitiḥ samānī samānam manaḥ saha cittam eṣām | samānam mantram abhi mantraye vaḥ samānena vo haviṣā juhomi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒मा॒नः । मन्त्रः॑ । सम्ऽइ॑तिः । स॒मा॒नी । स॒मा॒नम् । मनः॑ । स॒ह । चि॒त्तम् । ए॒षा॒म् । स॒मा॒नम् । मन्त्र॑म् । अमि । मं॒त्र॒ये॒ । वः॒ । स॒मा॒नेन । वः॒ । ह॒विषा॑ । जु॒हो॒मि॒ ॥ १०.१९१.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:191» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:49» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्त्रः समानः) तुम्हारा विचार समान हो (समितिः समानी) सम्प्राप्ति या कार्यप्रवृत्ति समान हो (एषां-समानं मनः) इनका तुम्हारा समान मन्त्र (चित्तं सह) साथ चित्त भी समान हो (वः समानं मन्त्रम्) तुम्हारे समान मन्त्र को (अभिमन्त्रये) सम्पादित करता हूँ, बनाता हूँ (वः) तुम्हें (समानेन हविषा) समान प्रार्थनोपासन कर्म से (जुहोमि) अपनाता हूँ ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों के समान विचार, कार्यप्रवृत्ति समान, मन और चित्त समान होने चाहिये तथा स्तुति, प्रार्थना, उपासना समान होनी चाहिये ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

राष्ट्र में सब के साथ समान बर्ताव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] राष्ट्र में (मन्त्रः) = विचारपूर्वक बनाया गया नियम (समानः) = सब के लिये एक-सा हो । (समितिः) = सभा (समानी) = समान हो । न्यायालय अलग-अलग लोगों के लिये अलग-अलग न हों। (एषाम्) = इन सब प्रजाओं का (मनः) = मन (समानम्) = समान हो । (चित्तम्) = इनका चित्त भी (सह) = साथ-साथ हो, अर्थात् राष्ट्रोन्नति रूप एक ही कार्य की इच्छा से ये सब पूरे दिल से उसमें प्रवृत्त हों । [२] राजा प्रजा से कहता है कि मैं (वः) = तुम्हारे लिये (समानं मन्त्रं अभिमन्त्रये) = एक ही नियम का विचारपूर्वक स्थापन करता हूँ। और (व:) = तुम्हें (समानेन हविषा) = समान ही कर के द्वारा (जुहोमि) = खाता हूँ । जैसे बछड़ा माता से थोड़ा-थोड़ा दूध लेता है, इसी प्रकार राजा भी सब प्रजाओं से थोड़ा-थोड़ा कर लेता है [हु अदने] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राष्ट्र में सब प्रजाओं से समान बर्ताव हो । कर पद्धति सब के लिये समान हो ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्त्रः समानः) युष्माकं विचारः समानो भवेत् (समितिः समानी) सम्प्राप्तिः कार्यप्रवृत्तिर्वा-समानी भवतु (एषां समानं मनः-चित्तं सह) एतेषां युष्माकं मनः समानं चित्तं समानमस्तु, मन्तव्यं चिन्तनीयमेकं भवतु (वः समानं मन्त्रम्-अभिमन्त्रये) युष्मभ्यं समानं मन्त्रं खल्वभ्याह्वये सम्पादयामि (वः समानेन हविषा जुहोमि) युष्मान् समानेन प्रार्थनोपासनकर्मणा स्वीकरोमि ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let your guiding mantra be one and equal, your assembly, one and equal, your mind, one in accord in thinking and purpose for all of you. I commit you all to the same one mantra for thought, goals and policy, and I vest you all with equal and common means and methods for living and working.