यथा पूर्व सृष्टि का निर्माण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह (धाता) = सब सृष्टि का निर्माण करनेवाला प्रभु (सूर्याचन्द्रमसौ) = सूर्य व चाँद को (यथापूर्वम्) = जैसा इससे पूर्व की सृष्टि में बनाया था वैसा ही अकल्पयत् बनाता है। इन सूर्य व चन्द्र से ही दिन व रात्रि के विभाग की कल्पना स्पष्ट होती है । [२] (च) = और वे प्रभु (दिवम्) = द्युलोक को (च) = और (पृथिवीम्) = पृथिवी को, (अन्तरिक्षम्) = अन्तरिक्ष लोक को (अथ उ) = और निश्चय से (स्वः) = प्रकाशमय स्वर्गलोक को यथापूर्व ही बनाते हैं। यथापूर्व बनाने की भावना यही है कि उस सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् प्रभु से बनाई गयी सृष्टि में कोई न्यूनता नहीं होती, जिसको कि दूर किया जाए। पूर्ण होने से इसमें परिवर्तन की आवश्यकता ही नहीं होती 'पूर्णमदः पूर्णमिदम्' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उस प्रभु द्वारा प्रलयानन्तर यथापूर्व सृष्टि का फिर से निर्माण होता है। यह सूक्त नश्वरता के स्मरण से जीवन को निष्पाप बनानेवाला है। यह पवित्र जीवनवाला व्यक्ति प्रभु का स्मरण करता है और मेल-मिलाप से, अविरोध से चलता है। इसका नाम 'संवनन' हो जाता है, उत्तम उपासक [वन संभक्तौ] व उत्तम विजेता [वन् = win ] । यह प्रभु से प्रार्थना करता है कि-