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ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत । ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ तत॑: समु॒द्रो अ॑र्ण॒वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛtaṁ ca satyaṁ cābhīddhāt tapaso dhy ajāyata | tato rātry ajāyata tataḥ samudro arṇavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋ॒तम् । च॒ । स॒त्यम् । च॒ । अ॒भी॑द्धात् । तप॑सः । अधि॑ । अ॒जा॒य॒त॒ । ततः॑ । रात्री॑ । अ॒जा॒य॒त॒ । ततः॑ । स॒मु॒द्रः । अ॒र्ण॒वः ॥ १०.१९०.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:190» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:48» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में परमात्मा प्रकृति से सृष्टि को रचता है, इससे सूर्य-चन्द्र आदि को पूर्व सृष्टि की भाँति रचता है, पुनः-पुनः सृष्टिरचना उसका कौशल है, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतं च) यथार्थ सर्वविद्याधिकरण वेदज्ञान भी (सत्यं च) सत् वर्त्तमान पदार्थों में साधु-सब को साधनेवाला तीन गुणोंवाला प्रकृति-नामक उपादान तथा (अभीद्धात् तपसः) सब ओर से दीप्त ज्ञानमय तप से (अध्यजायत) प्रसिद्ध होता है (ततः) उससे (रात्री) महाप्रलय के अनन्तर प्रलयरूप रात्रि (अजायत) प्रसिद्ध होती है (ततः) पुनः (अर्णवः समुद्रः) गतिमान् परमाणु समुद्र प्रसिद्ध होता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व उत्पत्ति, स्थितिविषयक मूलज्ञान वेद तथा उपादानकारण प्रकृतिरूप अव्यक्त सृष्टिकर्ता परमेश्वर के ज्ञानमय तप से उसके सम्मुख आते हैं। दोनों के संसर्ग से महाप्रलय का अन्त प्रलयरूप रात्रि बनती है, उससे गतिवाला हलचल करता हुआ परमाणुओं का समुद्र प्रकट हो जाता है, यह हलचल सृष्टिप्रवाह को चालू करती है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तपसे ऋत व सत्य की उत्पत्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रलय की समाप्ति पर प्रभु सृष्टि के निर्माण का ईक्षण, विचार व कामना करते हैं 'तदैक्षत०, सोऽकामयत्' । प्रभु का यह ईक्षण - ज्ञान ही तप कहलाता है 'यस्य ज्ञानमयं तपः ' । प्रभु के इस (अभि इद्वात्) = सर्वतः देदीप्यमान (तपसः) = तप से (ऋतं च) ऋत (च) = व (सत्यं च) = सत्य (अध्यजायत) = - प्रकट हुए। प्रकृति विषयक सब नियम 'ऋत' कहलाते हैं और जीव विषयक सब नियम 'सत्य' कहलाते हैं । [२] इन नियमों के प्रादुर्भूत हो जाने पर (ततः) = तब इन नियमों के अनुसार (रात्री) = शक्ति की तरह अन्धकारमयी 'तम' नामवाली यह प्रकृति [तम आसीत् तमसा गूढमग्रे] (अजायत) = सृष्टि के रूप में हो गई । 'तमः ' वाग्नी प्रकृति ने इस विकृतिरूप संसार को जन्म दिया। [३] (ततः) = उस समय (समुद्रः) = प्रकृति का यह अणुसागर (अर्णवः) = खूब गतिवाला हो उठा [अर्णस्=wave] इसमें लहरें उठने लगीं। अणु समुद्र में गति आने पर ही द्व्यणुक आदि क्रम से सृष्टि के पदार्थों के निर्माण का प्रारम्भ होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के तप से ऋत व सत्य उत्पन्न हुए ।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते परमात्मा प्रकृतितः सृष्टिं रचयति ततः सूर्यचन्द्रादिकं पूर्वसृष्टिवद् रचयति पुनः पुनः सृष्टिरचनं तस्य कौशलम्, इत्यादि विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतं च सत्यं च) ऋतं यथार्थं सर्वविद्याधिकरणं वेदज्ञानं च सत्यं सत्सु साधु त्रिगुणमयं प्रकृत्यात्मकमुपादानञ्च (अभीद्धात्-तपसः) अभितः सर्वत इद्धात्-दीप्तात्-ज्ञानमयात् तपसः ‘तस्य ज्ञानमयं तपः’ (अध्यजायत) प्रसिद्धं भवति (ततः रात्री-अजायत) ततो महाप्रलयानन्तरं प्रलयरूपा रात्री प्रसिद्धा भवति (ततः-अर्णवः समुद्रः) तदनन्तरं-अर्णवो गतिमान् परमाणुसमुद्रः प्रसिद्धो भवति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - By the arduous will of Divinity, Prakrti manifested in existence in its simultaneous modes of Satyam and Rtam, constant and mutable, under the Eternal Law. Then arose the night and darkness of no positive name. Then arose the spatial ocean of indeterminate particles of existence.