यो अ॒स्य पा॒रे रज॑सः शु॒क्रो अ॒ग्निरजा॑यत । स न॑: पर्ष॒दति॒ द्विष॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yo asya pāre rajasaḥ śukro agnir ajāyata | sa naḥ parṣad ati dviṣaḥ ||
पद पाठ
यः । अ॒स्य । पा॒रे । रज॑सः । शु॒क्रः । अ॒ग्निः । अजा॑यत । सः । नः॒ । प॒र्ष॒त् । अति॑ । द्विषः॑ ॥ १०.१८७.५
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:187» मन्त्र:5
| अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:45» मन्त्र:5
| मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:5
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो परमेश्वर (अस्य) इस (रजसः) अन्तरिक्ष के (पारे) ऊपर स्वामी रूप से (शुक्रः) शुभ्र (अग्निः) अग्रणायक (अजायत) प्रसिद्ध है (स नः०) पूर्ववत् ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर इस महान् आकाश के भी ऊपर स्वामी रूप से प्रकाशमान अग्रणायक है, दुष्टों को दूर करता है, वह स्तुति करने योग्य है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
रजोगुण से परे
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (अस्य रजसः) = इस रजोगुणात्मक संसार से (पारे) = पार हैं, इसमें असक्त हैं, (शुक्रः) = अत्यन्त दीप्त हैं, (अग्निः अजायत) = सब के अग्रेणी हुए हैं, (सः) = वे प्रभु (नः) = हमें (द्विषः) = सब द्वेष की भावनाओं से (अतिपर्षत्) = पार करें। [२] प्रभु कृपा से जब हम रजोगुण से ऊपर उठ पायेंगे तब हमारे हृदय ज्ञान की ज्योति से दीप्त होंगे। उस समय हम निरन्तर उन्नतिपथ पर आगे बढ़ रहे होंगे। द्वेष की भावनाएं उस समय समाप्त हो जायेंगी।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्मरण हमें रजोगुण से ऊपर उठाकर निद्वेष बनाता है। सम्पूर्ण सूक्त द्वेष से ऊपर उठने की बात कह रहा है । पाँच बार इस भाव को कहने का प्रयोजन यह है कि हम 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र व निषाद' किसी से भी द्वेष न करें । द्वेष से ऊपर उठने के लिये आवश्यक है कि हम 'श्येन' - गतिशील बने रहें, 'आग्नेय' अग्नि पुत्र 'अगि गतौ ' = खूब गतिशील । इसी श्येन आग्नेय का अगला सूक्त है-
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (यः-अस्य रजसः पारे) यः परमेश्वरोऽस्यान्तरिक्षस्योपरि स्वामिरूपेण (शुक्रः-अग्निः-अजायत) शुभ्रोऽग्रणायकः प्रसिद्धो भवति (स नः० ) पूर्ववत् ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - That Agni, self-refulgent supreme power that exists and manifests in and over and above this firmament and the oceanic depth of immeasurable space may, we pray, cast off our enemies and render us clean and free at peace.
